Bihar voter list : बिहार की मतदाता सूची को लेकर उठे विवाद में अब सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया है। सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए मामले पर तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। यह याचिका बिहार में कथित रूप से मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं और फर्जी नामों को लेकर दायर की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची में संशोधन से जुड़े विवाद पर सुनवाई के लिए 13 जुलाई (गुरुवार) की तारीख तय कर दी है। यह सुनवाई तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा, राजद सांसद मनोज झा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और एनजीओ PUCL की ओर से दायर याचिकाओं पर एक साथ की जाएगी। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जयमाल्या बागची की पीठ ने सोमवार को याचिकाओं को स्वीकार करते हुए चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया और कहा कि संबंधित सभी पक्ष आयोग को नोटिस भेज सकते हैं।
क्या है मामला?
बिहार में इस साल अक्टूबर-नवंबर में संभावित विधानसभा चुनाव से पहले, चुनाव आयोग ने “विशेष एवं गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR)” के तहत नई मतदाता सूची तैयार करने का आदेश दिया है। इसके लिए मतदाताओं को नए प्रमाण पत्रों के साथ फॉर्म भरने का निर्देश दिया गया है।
नए नियमों के तहत:
-
1987 से पहले जन्मे मतदाता: जन्म प्रमाणपत्र अनिवार्य।
-
1987–2004 के बीच जन्मे: स्वयं और माता/पिता में से किसी एक का प्रमाणपत्र।
-
2004 के बाद जन्मे: स्वयं और माता-पिता दोनों का प्रमाणपत्र।
हालांकि, आधार, राशन कार्ड या पिछली मतदान रसीदों को वैध दस्तावेज नहीं माना जा रहा है।
विरोध क्यों?
महुआ मोइत्रा और अन्य याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस आदेश से करीब 3 करोड़ मतदाता वोटिंग से वंचित हो सकते हैं। इनमें गरीब, ग्रामीण, महिलाएं और अल्पसंख्यक वर्ग से जुड़े लोग प्रमुख रूप से प्रभावित होंगे, जिनके पास अपेक्षित दस्तावेज नहीं हैं।
महुआ ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1), 21, 325 और 326 का उल्लंघन बताया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से बिहार में आदेश रद्द करने और अन्य राज्यों में इसे लागू न करने का स्थगन आदेश मांगा है।
प्रमुख वकील क्या बोले?
उन्होंने अदालत को बताया कि: “हजारों ऐसे लोग हैं, जो दशकों से मतदान कर रहे हैं, फिर भी अब उन्हें अपनी पात्रता दोबारा साबित करनी होगी। यह न केवल असंवैधानिक है बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ धोखा है।”
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग का कहना है कि जिन मतदाताओं के नाम 2003 की लिस्ट में हैं, उनके लिए यह आदेश लागू नहीं होता। लेकिन 2003 के बाद शामिल हुए नए मतदाताओं को वैध दस्तावेज पेश करने होंगे, ताकि मतदाता सूची की शुद्धता बनी रहे।
सुप्रीम कोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणी
जस्टिस सुधांशु धूलिया ने यह जरूर कहा कि:
“चूंकि बिहार में अभी चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं हुई है, इसलिए फिलहाल समयसीमा (25 जुलाई) का कोई विधिक महत्व नहीं है।”
आगे क्या?
-
अगली सुनवाई 13 जुलाई को होगी।
-
चुनाव आयोग को जवाब दाखिल करना होगा।
-
कांग्रेस समेत अन्य दलों द्वारा नई याचिकाएं दाखिल करने की भी संभावना है।
बिहार की यह मतदाता सूची विवाद न सिर्फ राज्य की चुनावी राजनीति पर असर डाल सकता है, बल्कि देशभर में मतदाता पहचान और पंजीकरण की प्रक्रिया पर सवाल भी खड़े कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट की आने वाली सुनवाई भारत के लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से अहम मानी जा रही है।