अंतरराष्ट्रीय

Fact Check: बिल गेट्स और बेमौसम बारिश का क्या है कनेक्शन? वायरल दावे की इनसाइड स्टोरी

Fact Check:  मार्च 2026 के महीने में जब उत्तर भारत भीषण गर्मी की तैयारी कर रहा था, तभी अचानक मौसम ने ऐसी करवट ली कि हर कोई दंग रह गया। दिल्ली-एनसीआर सहित कई राज्यों में काले बादल छा गए और झमाझम बारिश के साथ ओले गिरने लगे। इस राहत भरी फुहार के साथ ही डिजिटल दुनिया में दावों का एक ऐसा बवंडर उठा, जिसने वैज्ञानिक तथ्यों को भी पीछे छोड़ दिया। सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल होने लगे, जिनमें दावा किया गया कि यह बारिश प्राकृतिक नहीं है। ‘केमिकल स्प्रे’ और ‘केमट्रेल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर इसे ‘मौत की बारिश’ बताया जाने लगा। इन अफवाहों के केंद्र में थे माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स, जिन पर भारत के मौसम के साथ गुप्त प्रयोग करने के आरोप मढ़े गए।

बिल गेट्स और SCoPEx प्रोजेक्ट: विवाद की असली जड़ क्या है?

आखिर इस पूरे विवाद में बिल गेट्स का नाम कहाँ से आया? दरअसल, इसकी जड़ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एक पुराने रिसर्च प्रोजेक्ट ‘SCoPEx’ (Stratospheric Controlled Perturbation Experiment) में छिपी है। बिल गेट्स ने इस प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता दी थी, जो ‘सोलर जियोइंजीनियरिंग’ का एक हिस्सा था। इस तकनीक का उद्देश्य वायुमंडल में सूक्ष्म कण छोड़कर सूर्य की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित करना था, ताकि धरती के बढ़ते तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) को कम किया जा सके। हालांकि, इस प्रोजेक्ट को लेकर दुनिया भर में भारी विरोध हुआ और हकीकत यह है कि साल 2024 में ही इस प्रयोग को पूरी तरह रद्द कर दिया गया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रयोग कभी भारत की सीमाओं के भीतर हुआ ही नहीं।

वैज्ञानिक पक्ष: पश्चिमी विक्षोभ और कम दबाव की रेखा का दुर्लभ संयोग

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के वैज्ञानिकों ने इन तमाम वायरल दावों को आधारहीन बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि एक शक्तिशाली ‘पश्चिमी विक्षोभ’ (Western Disturbance) का परिणाम है। इस बार के मौसमी सिस्टम में एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति देखी गई, जहाँ लगभग 1,000 किलोमीटर लंबी एक सीधी कम दबाव वाली रेखा (Trough Line) बनी। इसी वजह से यह तंत्र इतना प्रभावी हो गया कि कई शहरों में 70 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलीं और तापमान में 10 डिग्री सेल्सियस तक की भारी गिरावट दर्ज की गई। यह पूरी तरह से एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसका किसी मानवीय प्रयोग से कोई लेना-देना नहीं है।

ओले और प्लास्टिक का भ्रम: विज्ञान क्या कहता है?

सोशल मीडिया पर कई लोग ओलों के देर तक न पिघलने को ‘प्लास्टिक’ या ‘केमिकल’ होने का सबूत मान रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे एक सरल भौतिक विज्ञान है। जब ओलावृष्टि अधिक मात्रा में होती है और ओलों की मोटी परत जमा हो जाती है, तो वे एक-दूसरे को ठंडा रखते हैं। साथ ही, आसमान में बादलों के छाए रहने के कारण सूर्य की गर्मी जमीन तक नहीं पहुँच पाती, जिससे ओले पिघलने में सामान्य से अधिक समय लेते हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इसे किसी कृत्रिम साजिश से जोड़ना केवल आधी-अधूरी जानकारी का परिणाम है।

कृत्रिम बारिश बनाम कुदरत: क्या इंसान मौसम को नियंत्रित कर सकता है?

हालाँकि विज्ञान ने ‘क्लाउड सीडिंग’ (Cloud Seeding) के जरिए कृत्रिम बारिश कराने में सफलता पाई है, लेकिन यह तकनीक केवल बहुत छोटे और स्थानीय स्तर पर ही काम कर सकती है। दिल्ली या उत्तर भारत जैसे विशाल क्षेत्र में मानसून जैसे बड़े मौसमी चक्रों या इतने शक्तिशाली पश्चिमी विक्षोभ को नियंत्रित करना फिलहाल मानव विज्ञान के लिए नामुमकिन है। अंततः, बिल गेट्स से जुड़े तमाम दावे पूरी तरह काल्पनिक हैं। दिल्ली की यह बारिश कुदरत के बदलते मिजाज का एक हिस्सा थी, जिसे विज्ञान की कसौटी पर आसानी से समझा जा सकता है।

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