Bird Sounds : शहरों के बढ़ते विस्तार और पर्यावरण में बदलाव का असर पक्षियों पर साफ दिखाई दे रहा है। दक्षिण कोरिया के बुसान स्थित नकडोंग एस्टुअरी इको सेंटर एंड पार्क के निदेशक जिनवॉन सियो ने बताया कि हर साल रेस्क्यू की जरूरत वाले वन्यजीवों की संख्या बढ़ रही है। हालांकि, प्रशिक्षित कर्मचारियों, आधुनिक उपकरणों और rehabilitation सुविधाओं की सीमित उपलब्धता के कारण घायल जीवों की देखभाल करना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
प्राकृतिक आवास बचाना बेहद जरूरी
साइबेरिया, यूरोप और मध्य एशिया से भारत आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में कमी चिंता का विषय है। जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ शहरीकरण और प्राकृतिक आवासों के नुकसान ने भी उनकी मुश्किलें बढ़ाई हैं। विशेषज्ञ के अनुसार, पक्षियों के लिए सुरक्षित क्षेत्रों का विस्तार, जल स्रोतों का संरक्षण और शिकार पर प्रभावी रोक लगाना जरूरी है। साथ ही प्रवासी पक्षियों के मार्गों की निगरानी के लिए विभिन्न देशों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए।
बिजली की तारों से भी पक्षियों को खतरा
प्रवासी पक्षियों को बिजली की लाइनों से भी गंभीर खतरा रहता है। तारों पर स्पष्ट दिखाई देने वाले निशान लगाए जा सकते हैं, जिससे पक्षी उनसे टकराने से बच सकें। जहां संभव हो, बिजली और अन्य यूटिलिटी लाइनों को भूमिगत किया जाना चाहिए। इसके अलावा पक्षियों के ठहरने वाले स्थानों पर प्रकाश प्रदूषण कम करना भी जरूरी है। खेती में जहरीले पेस्टिसाइड और रोडेंटिसाइड के अत्यधिक इस्तेमाल को नियंत्रित करने की जरूरत है।
इमारतों की खिड़कियां बन रहीं बड़ी वजह
नकडोंग इको सेंटर में घायल होकर पहुंचने वाले पक्षियों में बड़ी संख्या उन पक्षियों की है, जो इमारतों से टकराते हैं। इनमें खिड़कियों से टकराने के मामले सबसे ज्यादा सामने आते हैं। इसके अलावा बिजली की लाइनें, वाहन और दूसरी मानव निर्मित संरचनाएं भी पक्षियों के घायल होने की प्रमुख वजह हैं।
बर्ड फ्रेंडली बिल्डिंग डिजाइन अपनाने की जरूरत
शहरी इलाकों में निर्माण के दौरान पक्षियों की सुरक्षा का ध्यान रखा जा सकता है। पारदर्शी और reflective glass पर ऐसे visual markers लगाए जाने चाहिए, जिन्हें पक्षी आसानी से देख सकें। अत्यधिक रोशनी प्रतिबिंबित करने वाले कांच से बचना बेहतर है। खिड़कियों का डिजाइन इस तरह रखा जा सकता है कि आसमान और पेड़ों का reflection कम हो। माइग्रेशन के दौरान देर रात अनावश्यक रोशनी बंद करने से भी पक्षियों को मदद मिलेगी।
शहरों में बनाएं हरित और सुरक्षित क्षेत्र
शहरी wetlands के आसपास buffer zone बनाए जाने चाहिए। घरों की बालकनी में देशी पेड़-पौधे लगाकर पक्षियों के लिए प्राकृतिक वातावरण तैयार किया जा सकता है। वहां साफ पानी की व्यवस्था भी होनी चाहिए। पालतू जानवरों, खासकर बिल्लियों को पक्षियों से दूर रखना जरूरी है। छोटी-छोटी हरित जगहों को जोड़कर ecological corridor और जरूरत पड़ने पर artificial nests भी बनाए जा सकते हैं।
स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर
प्रवासी पक्षियों के संरक्षण से स्थानीय समुदायों को भी फायदा हो सकता है। लोगों को bird guide और bird monitor के तौर पर प्रशिक्षित किया जाए तो उनकी आय के नए साधन विकसित हो सकते हैं। साथ ही bird tourism को बढ़ावा मिलने से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है और संरक्षण के प्रति लोगों की भागीदारी भी बढ़ेगी।
रेस्क्यू सेंटर में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं जरूरी
नकडोंग इको सेंटर में पांच पशु चिकित्सक वन्यजीवों का इलाज करते हैं। यहां एक्स-रे, हाइपरबेरिक ऑक्सीजन चैंबर, अल्ट्रासाउंड, एंडोस्कोपी, इनक्यूबेटर, स्टेरलाइजर और टोनोमीटर जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। विशेषज्ञ का मानना है कि इस तरह की चिकित्सा और rehabilitation सुविधाएं हर बड़े इको पार्क में उपलब्ध होनी चाहिए।
घायल और लुप्तप्राय जीवों की विशेष देखभाल
अगर किसी वन्यजीव का इलाज और rehabilitation करने के बावजूद उसे वापस जंगल में छोड़ना संभव नहीं होता, तो निर्धारित दिशानिर्देशों के तहत euthanasia की प्रक्रिया अपनाई जाती है। हालांकि लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने के लिए उन्हें दूसरे विशेषज्ञ संस्थानों में भेजने का विकल्प भी रखा जाता है।
नवजात पक्षियों को उड़ान की ट्रेनिंग
अनाथ या नवजात वन्यजीवों को केंद्र में विशेष निगरानी में रखा जाता है। कर्मचारियों द्वारा उन्हें भोजन देने के साथ तापमान और साफ-सफाई का ध्यान रखा जाता है। उनके वजन, शारीरिक विकास और व्यवहार में होने वाले बदलावों को लगातार रिकॉर्ड किया जाता है। जंगल में लौटाने से पहले उन्हें प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालने के लिए उड़ने और भोजन तलाशने जैसी जरूरी गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जाता है।
पक्षियों को वापस बुलाने की जिम्मेदारी हमारी
अगर घर और शहरों में फिर से पक्षियों की चहचहाहट सुननी है तो प्रकृति के अनुकूल जीवनशैली अपनानी होगी। सुरक्षित बालकनी, देशी पौधे, साफ पानी, artificial nests और हरित क्षेत्र पक्षियों के लिए बेहतर वातावरण बना सकते हैं। छोटे-छोटे प्रयासों से इंसानों और पक्षियों के बीच बढ़ती दूरी को कम किया जा सकता है।
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