British Budget Tradition
British Budget Tradition: दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों, भारत और ब्रिटेन, की संसदों में बजट सत्र के दौरान बेहद दिलचस्प और भिन्न परंपराएं प्रचलित हैं। ये परंपराएं न केवल सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं, बल्कि संसदीय इतिहास की गहराई को भी उजागर करती हैं। जहां भारत में बजट की छपाई शुरू होने से पहले वित्त मंत्रालय में ‘हलवा सेरेमनी’ का आयोजन किया जाता है, जिसमें वित्त मंत्री खुद अपने हाथों से कर्मचारियों को हलवा बांटते हैं, वहीं ब्रिटेन की संसद (वेस्टमिंस्टर) में एक ऐसी सदियों पुरानी परंपरा है जो पहली बार सुनने में काफी अजीब लग सकती है।
ब्रिटेन की संसद, जिसे ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ कहा जाता है, अपने कड़े अनुशासन और नियमों के लिए जानी जाती है। सामान्य दिनों में किसी भी सांसद को सदन के भीतर कुछ भी खाने या पीने की अनुमति नहीं होती है। यहां तक कि पानी पीने के लिए भी विशेष प्रोटोकॉल का पालन करना पड़ता है। लेकिन बजट पेश करने वाले दिन, जिसे ‘बजट डे’ कहा जाता है, इन सख्त नियमों में वित्त मंत्री यानी ‘चांसलर ऑफ द एक्सचेकर’ के लिए एक विशेष ढील दी जाती है। इस ऐतिहासिक छूट के तहत, वित्त मंत्री अपने लंबे बजट भाषण के दौरान सदन में शराब (Alcohol) का सेवन कर सकते हैं।
यह परंपरा किसी आधुनिक शौक का हिस्सा नहीं बल्कि सदियों पुराने संसदीय इतिहास से जुड़ी है। पुराने समय में बजट भाषण आज की तुलना में काफी लंबे हुआ करते थे, जो कई घंटों तक चलते थे। लंबे समय तक बोलने के कारण वित्त मंत्री का गला सूख जाता था और आवाज भारी होने लगती थी। ऐसे में अपनी आवाज को दुरुस्त रखने और ऊर्जा बनाए रखने के लिए चांसलर को अपनी पसंद का कोई भी पेय, जिसमें वाइन, ब्रांडी या व्हिस्की शामिल हो सकती थी, पीने की अनुमति दी गई। यह उनकी व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता था कि वे पानी पिएंगे या मदिरा।
समय बदलने के साथ ब्रिटिश राजनीतिज्ञों की पसंद भी बदली है। पिछले कुछ दशकों में इस परंपरा का पालन बहुत कम देखा गया है। 1997 में जब गॉर्डन ब्राउन चांसलर थे, तो उन्होंने शराब के बजाय मिनरल वॉटर को चुना था। तब से लेकर अब तक ज्यादातर वित्त मंत्रियों ने सादे पानी या नींबू पानी को ही प्राथमिकता दी है। इसका एक बड़ा कारण सोशल मीडिया और सार्वजनिक छवि भी है। आज के दौर में कोई भी राजनेता संसद में बजट जैसे गंभीर विषय पर भाषण देते समय शराब पीते हुए नहीं दिखना चाहता, ताकि किसी भी प्रकार के विवाद या नकारात्मक संदेश से बचा जा सके।
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व चांसलर ऋषि सुनक, जो अपनी ‘टीटोटलर’ (पूरी तरह शराब से दूर रहने वाली) जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं, उनके कार्यकाल में इस पुरानी परंपरा का कोई अस्तित्व नजर नहीं आया। इसी तरह, जेरेमी हंट और हालिया चांसलर रेचल रीव्स ने भी सदन में केवल पानी पीने को ही प्राथमिकता दी है। हालांकि कानूनन उन्हें आज भी शराब पीने की छूट है, लेकिन आधुनिक दौर की राजनीतिक शुचिता ने इस परंपरा को लगभग लुप्तप्राय बना दिया है।
भारत और ब्रिटेन की ये परंपराएं अपने-अपने समाज के मूल्यों को दर्शाती हैं। भारत में जहां ‘हलवा सेरेमनी’ के जरिए किसी बड़े काम की शुरुआत मीठे से करने और सामूहिक उल्लास की भावना दिखती है, वहीं ब्रिटेन की यह परंपरा उनके संसदीय इतिहास की निरंतरता और लचीलेपन का प्रतीक है। भले ही आज के ब्रिटिश मंत्री शराब से परहेज कर रहे हों, लेकिन यह नियम आज भी ब्रिटिश लोकतंत्र की एक विशिष्ट पहचान बना हुआ है।
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