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Chabahar Port Budget 2026: चाबहार पोर्ट के बजट में भारी कटौती, अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से भारत ने हाथ खींचे?

Chabahar Port Budget 2026:  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए केंद्रीय बजट 2026 ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सामरिक हलकों में सभी को चौंका दिया है। भारत सरकार ने अपनी सबसे महत्वाकांक्षी और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह परियोजना के लिए इस बार बजट में ‘शून्य’ आवंटन किया है। यह फैसला इसलिए हैरान करने वाला है क्योंकि पिछले कई वर्षों से भारत इस मेगा कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के विकास के लिए औसतन हर साल 100 करोड़ रुपये की राशि सुरक्षित रखता था। बजट में अचानक आई इस कमी ने इस प्रोजेक्ट के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और अमेरिकी प्रतिबंधों का कड़ा प्रहार

चाबहार बंदरगाह के लिए फंड न दिए जाने के पीछे मुख्य कारण वाशिंगटन से मिल रहे कड़े संकेत माने जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों का शिकंजा बेहद कस दिया है। पिछले साल सितंबर में अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सख्त प्रतिबंध लागू किए थे, हालांकि भारत के रणनीतिक हितों को देखते हुए चाबहार परियोजना को छह महीने की विशेष छूट दी गई थी। अब यह छूट 26 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रही है, जिससे भारत के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है।

25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ की धमकी और भारत का रक्षात्मक रुख

सूत्रों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने उन सभी देशों को खुले तौर पर चेतावनी दी है जो ईरान के साथ किसी भी प्रकार का व्यापारिक संबंध जारी रखेंगे। अमेरिका ने ऐसे देशों से आयात होने वाले सामानों पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी है। भारत के लिए अमेरिका एक बड़ा व्यापारिक भागीदार है, इसलिए सरकार ने फिलहाल इस परियोजना पर होने वाले सीधे खर्च को रोककर एक सुरक्षित रास्ता अपनाने का निर्णय लिया है। बजट आवंटन का न होना इसी दबाव का प्रत्यक्ष परिणाम दिखाई दे रहा है।

चाबहार की सामरिक अहमियत और INSTC का सपना

चाबहार बंदरगाह भारत के लिए केवल एक व्यापारिक केंद्र नहीं है, बल्कि यह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का प्रवेश द्वार है। 7,200 किलोमीटर लंबी यह विशाल परियोजना भारत को बिना पाकिस्तान जाए सीधे अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक पहुंच प्रदान करती है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (चीन द्वारा विकसित) के जवाब में भारत ने चाबहार में भारी निवेश किया है ताकि क्षेत्र में शक्ति संतुलन बना रहे। इस कनेक्टिविटी के ठप होने से भारत के मध्य एशियाई देशों के साथ संबंधों पर गहरा असर पड़ सकता है।

‘रुको और देखो’ की नीति: भारत की कूटनीतिक चुप्पी

भले ही बजट के आंकड़ों में चाबहार के लिए जगह न मिली हो, लेकिन विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत इस परियोजना से पीछे नहीं हटा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, भारत सरकार अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है। भारत का मुख्य तर्क यह है कि चाबहार एक मानवीय और क्षेत्रीय विकास परियोजना है, जिसे व्यापारिक प्रतिबंधों से अलग रखा जाना चाहिए। फिलहाल, भारत सरकार अमेरिकी छूट की समय सीमा समाप्त होने के बाद की स्थितियों का बारीकी से आकलन कर रही है।

भविष्य की चुनौतियां और क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव

चाबहार प्रोजेक्ट पर आए इस संकट ने भारत के लिए ‘दो नावों की सवारी’ जैसी स्थिति पैदा कर दी है। एक तरफ उसे अपने पुराने सामरिक सहयोगी ईरान के साथ संबंधों को बचाना है, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक युद्ध से भी बचना है। यदि भारत इस प्रोजेक्ट को आगे नहीं बढ़ा पाता है, तो यह मध्य एशिया में भारत की उपस्थिति को कमजोर कर सकता है और चीन के प्रभाव को बढ़ाने का मौका दे सकता है। आने वाले कुछ महीने इस बात की दिशा तय करेंगे कि चाबहार का रास्ता व्यापार के लिए खुलेगा या प्रतिबंधों की भेंट चढ़ जाएगा।

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