CBSE News
CBSE News: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) की सिफारिशों को अमली जामा पहनाते हुए एक क्रांतिकारी निर्णय लिया है। बोर्ड ने अब कक्षा 6 के विद्यार्थियों के लिए ‘तीसरी भाषा’ (R3) के अध्ययन को पूरी तरह अनिवार्य घोषित कर दिया है। बोर्ड द्वारा जारी किए गए नवीनतम सर्कुलर के माध्यम से सभी संबद्ध स्कूलों को यह कड़ा निर्देश दिया गया है कि वे इस नई व्यवस्था को अगले 7 दिनों के भीतर अपने शैक्षणिक ढांचे में शामिल करें। ‘स्कूल शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचा 2023’ (NCF-SE) के सिद्धांतों पर आधारित इस पहल का मुख्य ध्येय छात्रों के भीतर भाषाई विविधता, सांस्कृतिक गहराई और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना है।
CBSE ने अपने आदेश में इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया है कि स्कूलों को किसी भी स्थिति में इस बदलाव को टालना नहीं है। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि भले ही वर्तमान में तीसरी भाषा के लिए आधिकारिक पाठ्यक्रम (Syllabus) या पाठ्यपुस्तकें पूरी तरह उपलब्ध न हों, लेकिन शिक्षण कार्य को तुरंत प्रारंभ करना अनिवार्य है। स्कूलों को यह निर्देश दिया गया है कि वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अध्ययन सामग्री और अन्य शैक्षणिक संसाधनों का अस्थायी रूप से उपयोग करें ताकि छात्रों की पढ़ाई में विलंब न हो। क्षेत्रीय अधिकारियों को इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने और जमीनी स्तर पर इसके कार्यान्वयन का डेटा एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
बोर्ड द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को समाहित किया गया है:
तत्काल शिक्षण: पाठ्यपुस्तकों के अभाव में भी कक्षाएं शुरू करना अनिवार्य है।
अनिवार्यता: सभी संबद्ध विद्यालयों के लिए इसे ‘अति आवश्यक’ श्रेणी में रखा गया है।
अस्थायी सामग्री: वैकल्पिक अध्ययन सामग्री के उपयोग की पूरी छूट दी गई है।
डिजिटल अपडेट: स्कूलों को अपने ‘ओएएसिस’ (OASIS) पोर्टल पर चुनी गई भाषा की जानकारी अपडेट करनी होगी।
दीर्घकालिक विकल्प: कक्षा 6 में चुनी गई भाषा ही भविष्य में कक्षा 9 और 10 में छात्रों के लिए विकल्प के रूप में उपलब्ध रहेगी।
त्रिभाषा मॉडल का अर्थ है छात्रों को तीन अलग-अलग भाषाओं का ज्ञान देना। NCF-SE 2023 के तहत लागू इस मॉडल के अनुसार, कक्षा 6 से 10 तक के विद्यार्थियों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा। इस मॉडल की एक अनिवार्य शर्त यह है कि चुनी गई इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी चाहिए (जैसे संस्कृत, हिंदी, तमिल, कन्नड़ या मराठी)। तीसरी भाषा के रूप में छात्र अंग्रेजी या किसी अन्य विदेशी भाषा का चुनाव कर सकते हैं। इस दूरदर्शी योजना का लक्ष्य बहुभाषावाद को बढ़ावा देना है, ताकि छात्र न केवल वैश्विक स्तर पर संवाद कर सकें, बल्कि अपनी भारतीय जड़ों और संस्कृति से भी जुड़े रहें।
सरकार और बोर्ड की योजना इस त्रिभाषा मॉडल को चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में प्रभावी बनाने की है। इसका अंतिम लक्ष्य 2031 की बोर्ड परीक्षाओं तक इस प्रणाली को पूरी तरह से सुव्यवस्थित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से छात्रों के संज्ञानात्मक विकास में मदद मिलेगी और वे एक साथ कई संस्कृतियों को समझने में सक्षम होंगे। स्कूलों को अपने क्षेत्रीय कार्यालयों को इस संदर्भ में सूचित करने और नई समय-सारणी तैयार करने को कहा गया है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत का आने वाला कल भाषाई रूप से समृद्ध और सशक्त हो।
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