छत्तीसगढ़

Chhattisgarh Assembly: छत्तीसगढ़ विधानसभा में बवाल, बस्तर की अधूरी सड़कें और स्वास्थ्य कर्मियों के संलग्नीकरण पर भिड़े सत्ता-विपक्ष

Chhattisgarh Assembly: छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के दौरान बस्तर संभाग में बुनियादी ढांचे के विकास और सरगुजा संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर सदन में गरमागरम बहस हुई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY/MGY) की खामियों और ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों व स्वास्थ्य कर्मियों की कमी पर चर्चा केंद्रित रही।छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज उस वक्त हड़कंप मच गया जब बस्तर की खस्ताहाल सड़कों और स्वास्थ्य कर्मियों के संलग्नीकरण के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए। क्या सरकार के पास बस्तर के विकास का कोई ठोस रोडमैप है या ये विवाद आने वाले चुनाव की बड़ी चुनौती बनेगा?

बस्तर की एलेंगनार-उरकापाल सड़क: बिना सर्वे टेंडर जारी करने का आरोप

विधानसभा की कार्यवाही के दौरान जगदलपुर विधायक किरण देव ने बस्तर क्षेत्र की महत्वपूर्ण एलेंगनार-उरकापाल-कांदानार सड़क का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि विभाग ने बिना किसी जमीनी हकीकत को जाने और बिना विस्तृत तकनीकी सर्वेक्षण (Detailed Survey) के ही सड़क निर्माण के टेंडर जारी कर दिए। विधायक देव ने कहा कि इस अदूरदर्शिता के कारण निर्माण कार्य में लगातार बाधाएं आ रही हैं और स्थानीय जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उनके अनुसार, यह सड़क क्षेत्र की जीवनरेखा है, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह योजना फाइलों में उलझ गई है।

18 किलोमीटर की अधूरी सड़क: तीन साल में सिर्फ 4 करोड़ का भुगतान

विधायक किरण देव ने सदन में आंकड़ों के साथ सवाल किया कि 18 किलोमीटर लंबी इस सड़क का टेंडर 31 जनवरी 2023 को हुआ था। उन्होंने पूछा कि पिछले तीन वर्षों में इस परियोजना पर कितना वास्तविक कार्य हुआ है और अब तक कितनी राशि का भुगतान ठेकेदारों को किया गया? विधायक ने चिंता जताई कि योजना को अब दो अलग-अलग टेंडरों में विभाजित किया जा रहा है, जिससे काम की गुणवत्ता और समय सीमा पर असर पड़ेगा। उन्होंने बताया कि अब तक केवल मिट्टी-मुरूम डालने और छोटी पुलिया का काम हुआ है, जो पहली ही बारिश में बह गया।

नक्सलवाद और भौगोलिक चुनौतियां: मंत्री केदार कश्यप का स्पष्टीकरण

इन तीखे सवालों का जवाब देते हुए मंत्री केदार कश्यप ने स्वीकार किया कि 18 किलोमीटर की इस सड़क का पूर्ण सर्वेक्षण नहीं हो पाया था। उन्होंने इसके पीछे मुख्य कारण क्षेत्र का ‘घोर नक्सल प्रभावित’ होना बताया। मंत्री ने जानकारी दी कि सुरक्षा कारणों और वन क्षेत्र की जटिल परिस्थितियों की वजह से सर्वे टीम को काम करने में दिक्कतें आईं। उन्होंने बताया कि अब तक केवल अर्थवर्क (Earthwork) हुआ है और 4 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। योजना के लिए कुल 8 करोड़ रुपये और डीएमएफ (DMF) फंड की राशि उपलब्ध है। उन्होंने आश्वस्त किया कि सरकार एक वर्ष के भीतर इस कार्य को पूर्ण करने का प्रयास करेगी।

मॉनिटरिंग के लिए टीम गठित करने की मांग और 20 दिन का अल्टीमेटम

विधायक किरण देव ने सदन में गलत जानकारी पेश किए जाने की आशंका जताते हुए एक विशेष टीम गठित कर साइट मॉनिटरिंग की मांग की। उन्होंने कहा कि जमीनी स्तर पर स्थिति दावों से अलग है। इस पर मंत्री केदार कश्यप ने घोषणा की कि अगले 20 दिनों के भीतर उच्चाधिकारियों की एक टीम स्थल का निरीक्षण करेगी। इस निरीक्षण के बाद आने वाली रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाएगा और कार्य की गति बढ़ाई जाएगी।

सरगुजा स्वास्थ्य केंद्रों में रिक्त पद: शहर बनाम ग्रामीण की लड़ाई

सड़क के मुद्दे के बाद विधायक प्रबोध मिंज ने सरगुजा जिले के स्वास्थ्य केंद्रों में कर्मचारियों की भर्ती का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वास्थ्य विभाग में नियुक्तियां तो हो रही हैं, लेकिन कर्मचारी केवल शहरी क्षेत्रों में सेवा देना चाहते हैं। ग्रामीण अंचलों के स्वास्थ्य केंद्र खाली पड़े हैं। मिंज ने पूछा कि क्या सरकार केंद्रीय स्तर पर भर्ती प्रक्रिया अपनाएगी ताकि रिक्त पदों को भरा जा सके? उन्होंने दावा किया कि कागजों पर जो पद भरे दिख रहे हैं, हकीकत में वे रिक्त हैं।

स्वास्थ्य मंत्री का बड़ा फैसला: प्रदेश में सभी ‘संलग्नीकरण’ तत्काल प्रभाव से निरस्त

स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने इन आरोपों पर जवाब देते हुए कहा कि सरगुजा में 75 से 80% पद भरे हुए हैं। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि कई कर्मचारी ‘संलग्नीकरण’ (Attachment) के जरिए अपनी मूल पोस्टिंग छोड़कर शहरों में जमे हुए हैं। सदन में एक बड़ा नीतिगत फैसला लेते हुए मंत्री ने घोषणा की कि पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में किए गए सभी अनावश्यक संलग्नीकरण तत्काल प्रभाव से निरस्त किए जाते हैं। अब हर स्वास्थ्य कर्मी को अपनी मूल पदस्थापना वाली जगह पर ही जाकर सेवा देनी होगी।

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