CG corruption case
CG corruption case: छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलकों में इन दिनों भारी बेचैनी का माहौल है। राज्य के करीब 50 वरिष्ठ अधिकारी, जिनमें आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) और आईएफएस (IFS) स्तर के कैडर शामिल हैं, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के घेरे में हैं। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने अपनी जांच के आधार पर राज्य सरकार से इन अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए अभियोजन स्वीकृति मांगी है। हालांकि, विधिक प्रक्रियाओं और फाइलों के फेरबदल के कारण जांच की गति धीमी पड़ती दिखाई दे रही है, जिससे जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी असर पड़ रहा है।
जांच एजेंसियों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के बावजूद नौ विशिष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति अब तक नहीं मिल पाई है। इनमें आईएएस इफ्फत आरा का नाम प्रमुख है, जिन पर पाठ्यपुस्तक निगम में कागज खरीदी और निविदाओं में अनियमितता के आरोप हैं। यह मामला अप्रैल 2024 से लंबित है। इसी तरह, आईएएस संजय अलंग पर समाज कल्याण विभाग में निराश्रित राशि के वितरण में गड़बड़ी का आरोप है, जिसकी अनुमति जनवरी 2025 से प्रतीक्षित है। आईएएस सुधाकर खलखो भी माटीकला बोर्ड में शासकीय धन के दुरुपयोग के आरोपों का सामना कर रहे हैं। इनके अलावा अनूप भल्ला और रमेश चंद्र दुग्गा सहित छह आईएफएस अधिकारियों पर भी गबन के मामलों में शिकंजा कसना बाकी है।
छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित कोयला लेवी घोटाले और शराब घोटाले ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासन दोनों को हिलाकर रख दिया है। जनवरी 2026 में आईएएस समीर बिश्नोई के खिलाफ जांच की स्वीकृति मिलने के बाद अब जांच का दायरा किरण कौशल, भीम सिंह और जय प्रकाश मौर्य जैसे अधिकारियों तक पहुँच गया है। वहीं, शराब घोटाले के तार पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड, अनिल टुटेजा और निरंजन दास से जुड़े होने के कारण एजेंसियां पूरी मुस्तैदी से साक्ष्य जुटा रही हैं। इन घोटालों ने न केवल राजस्व को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता की नींव पर भी प्रहार किया है।
भ्रष्टाचार की यह आंच स्वास्थ्य विभाग तक भी जा पहुँची है। सीजीएमएससी (CGMSC) निविदा प्रकरण में आईएएस चंद्रकांत वर्मा, अभिजीत सिंह, सीआर प्रसन्ना और कार्तिकेय गोयल के नाम जांच के दायरे में हैं। आरोप है कि दवाओं और उपकरणों की निविदा प्रक्रिया में निर्धारित नियमों को दरकिनार कर चहेतों को लाभ पहुँचाया गया। दूसरी ओर, राजस्व विभाग में पटवारी भर्ती परीक्षा में हुई कथित धांधली को लेकर आईएएस रमेश शर्मा की भूमिका की भी सूक्ष्म जांच की जा रही है। इन मामलों ने राज्य की चयन प्रक्रियाओं और विभागीय ठेकों की शुचिता पर सवालिया निशान लगा दिया है।
पुलिस विभाग में महादेव सट्टा ऐप घोटाले ने खाकी की छवि को धूमिल किया है। आईपीएस आनंद छाबड़ा, अजय यादव और अभिषेक पल्लव सहित कई अन्य अधिकारियों पर सट्टा प्रमोटरों को संरक्षण देने और अवैध वसूली के गंभीर आरोप हैं। साथ ही, वन विभाग में भी भ्रष्टाचार के मामले कम नहीं हैं। आईएफएस अरुण प्रसाद और विवेक आचार्य जैसे अधिकारियों पर नीलगिरी पौधा खरीदी और कैंपा (CAMPA) मद के करोड़ों रुपयों के दुरुपयोग के आरोप हैं। इन विभागों में लंबित स्वीकृतियों के कारण भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक जंग रुकी हुई है।
लगातार लंबित पड़ती स्वीकृतियों ने राज्य में प्रशासनिक जवाबदेही पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। विपक्षी दल इसे सरकार द्वारा भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का प्रयास बता रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष का तर्क है कि न्याय के नैसर्गिक सिद्धांत के तहत सभी पहलुओं की विधिक जांच आवश्यक है। आम जनता की निगाहें अब सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या इन 50 अधिकारियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई होगी, या फाइलों का यह सफर यूं ही चलता रहेगा? यह छत्तीसगढ़ के सुशासन की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
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