छत्तीसगढ़

Chhattisgarh Diwali 2025 : छत्तीसगढ़ में ‘भयमुक्त’ दिवाली, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लौटी रौनक, शांति और विकास की नई उम्मीद

Chhattisgarh Diwali 2025 : छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में इस बार दिवाली एक नई सुबह लेकर आई। दशकों से लाल आतंक की छाया में जी रहे गांवों ने पहली बार निर्भय होकर दीपावली का पर्व पूरे जोश और उल्लास से मनाया। दंतेवाड़ा, नकुलनार, बारसूर, पोटाली और कटेकल्याण जैसे क्षेत्रों में इस बार दीपों की रोशनी और पटाखों की गूंज ने डर और सन्नाटे की जगह ले ली।

नक्सलियों के आत्मसमर्पण से लौटी शांति

इस दिवाली की चमक के पीछे सबसे बड़ा कारण रहा नक्सलियों का बढ़ता आत्मसमर्पण। राज्य सरकार और सुरक्षा बलों की रणनीतियों के चलते आतंक का ग्राफ गिरा है और आम जनता को अब बेहतर सुरक्षा और विश्वास का अनुभव हो रहा है। नतीजतन, लोग खुलकर त्योहार मनाने लगे हैं।ग्रामीणों ने पारंपरिक वेशभूषा में देर रात तक नृत्य और गीत प्रस्तुत किए। एक-दूसरे के घरों में जाकर लक्ष्मी पूजन का प्रसाद बांटा गया। घरों के आंगन मिट्टी के दीयों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजे हुए थे, और आकाश में चमचमाती आतिशबाजियों ने मानो वर्षों के अंधेरे को रौशन कर दिया।

बाजारों में भी लौटी रौनक

इस बार दिवाली के दौरान बाजारों में जबरदस्त खरीदारी देखने को मिली। GST दरों में कमी के चलते इलेक्ट्रॉनिक सामान और दोपहिया वाहनों की कीमतों में राहत मिलने से लोग खुलकर खरीदारी कर सके। दंतेवाड़ा और आस-पास के कस्बों की दुकानों पर दिनभर भीड़ बनी रही। व्यापारी भी इस बार की दिवाली को “सबसे बेहतर” बता रहे हैं।

प्रशासन ने कहा: ये है उम्मीद की शुरुआत

स्थानीय प्रशासन और CRPF अधिकारियों ने इसे “नई उम्मीद की किरण” करार दिया है। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के आयोजन जनता और सरकार के बीच विश्वास बढ़ाने में सहायक होते हैं। साथ ही यह दर्शाता है कि शांति और विकास की दिशा में क्षेत्र आगे बढ़ रहा है।

ग्रामीणों ने दी खुली प्रतिक्रिया

ग्रामीणों का कहना है कि पहले जहां दिवाली पर गांव अंधेरे में डूबा रहता था, अब हर घर दीयों से जगमगाता नजर आया। एक ग्रामीण महिला ने कहा, “पहले दिवाली डर में बीतती थी, अब हम खुलकर हंस सकते हैं, पूजा कर सकते हैं।”

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में मनाई गई यह भयमुक्त दिवाली सिर्फ एक त्योहार नहीं थी, बल्कि यह शांति, विकास और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बन गई। यह दर्शाता है कि आतंक के साए से निकलकर जब गांव रोशनी की ओर बढ़ते हैं, तो सिर्फ दीये नहीं जलते, बल्कि भविष्य की उम्मीदें भी चमकने लगती हैं।

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