छत्तीसगढ़

Pradeep Sahu news: छत्तीसगढ़ अतिक्रमण केस: भाजपा नेता प्रदीप साहू की बढ़ी मुश्किलें

Pradeep Sahu news: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के गुरुर नगर पंचायत अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समर्थित नेता प्रदीप साहू अतिक्रमण के एक गंभीर मामले में फंसते नजर आ रहे हैं। तहसील न्यायालय गुरुर ने उनके खिलाफ बेदखली का वारंट जारी किया है, जिससे राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

क्या है मामला?

प्रदीप कुमार साहू, पिता डोमार सिंह साहू, पर आरोप है कि उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 930 के किनारे स्थित शासकीय घास भूमि (खसरा नंबर 599, रकबा 0.7 हेक्टेयर) में से 12.69 वर्ग मीटर जमीन पर अवैध निर्माण कर अतिक्रमण किया है।

प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार, यह भूमि गुरुर नगर में स्थित है, जिसकी लंबाई 4.50 मीटर और चौड़ाई 2.70 मीटर है। इस पर मकान निर्माण कर कब्जा किया गया, जिसे न्यायालय ने अवैध अतिक्रमण करार दिया।

न्यायालय की सख्त टिप्पणी

तहसीलदार गुरुर के न्यायालय ने अतिक्रमण की पुष्टि करते हुए न केवल बेदखली का वारंट जारी किया, बल्कि प्रदीप साहू को अर्थदंड से भी दंडित किया है। साथ ही आदेश दिया गया है कि 26 सितंबर से पहले अतिक्रमण हटाकर प्रशासनिक प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए।

क्या नगर पंचायत अध्यक्ष पर चलेगा बुलडोजर?

इस फैसले के बाद स्थानीय जनता और विपक्ष के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि जैसे भाजपा सरकार अन्य अतिक्रमणों पर बुलडोजर चलवाती है, क्या उसी कठोरता से अपने ही नेता के अवैध निर्माण पर भी कार्रवाई करेगी?

अध्यक्ष प्रदीप साहू का पक्ष

जब मीडिया ने पूरे मामले पर नगर पंचायत अध्यक्ष प्रदीप साहू से संपर्क किया तो उन्होंने कहा,“न्यायालय से जो आदेश जारी हुआ है, उसे हम चुनौती देंगे। हम पहले जिला प्रशासन और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय की शरण लेंगे।”उन्होंने यह भी कहा कि वे कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हैं और इस मामले में उचित न्यायिक विकल्पों पर विचार करेंगे।

राजनीतिक सरगर्मी और जनचर्चा

इस प्रकरण ने स्थानीय राजनीति में गर्मी ला दी है। विपक्ष इसे भाजपा की “दोहरे मापदंड वाली नीति” करार दे रहा है। जनता भी देखना चाहती है कि क्या प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करता है या राजनीतिक दबाव के आगे झुकता है।गुरुर नगर पंचायत अध्यक्ष प्रदीप साहू पर अतिक्रमण मामले में तहसील न्यायालय का बेदखली आदेश भाजपा के लिए एक नीतिगत कसौटी बनकर उभरा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासनिक मशीनरी इस मामले में कितनी पारदर्शिता और सख्ती बरतती है।

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