Chhattisgarh High Court
Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मानवता और न्याय की मिसाल पेश करते हुए एक मूक-बधिर युवती के साथ हुए जघन्य अपराध के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने बालोद जिले के एक दोषी को ‘मरते दम तक उम्रकैद’ की सजा सुनाई है। यह मामला न केवल एक अपराधी को दंडित करने के बारे में है, बल्कि यह उन चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है जो दिव्यांग पीड़ितों को न्याय पाने के दौरान झेलनी पड़ती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शारीरिक अक्षमता न्याय के मार्ग में बाधा नहीं बन सकती और संकेतों के माध्यम से दी गई गवाही उतनी ही सशक्त है जितनी कि मौखिक बयान।
यह विचलित करने वाली घटना 29 जुलाई 2020 की है, जो बालोद जिले के अर्जुंदा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आती है। 20 वर्षीय पीड़िता, जो जन्म से ही बोलने और सुनने में अक्षम थी, उस वक्त घर पर अकेली थी। उसके माता-पिता अपनी आजीविका के लिए खेत में काम करने गए हुए थे। सूनेपन का फायदा उठाकर एक दूर का रिश्तेदार, नीलम कुमार देशमुख, घर में घुस आया। उसने युवती की लाचारी का फायदा उठाते हुए उसके साथ अनाचार किया और मौके से फरार हो गया। शाम को जब मां घर लौटी, तो उसने अपनी बेटी को बेसुध और रोते हुए पाया, जिसने इशारों में अपने साथ हुई दरिंदगी की कहानी बयां की।
चूंकि पीड़िता बोल और सुन नहीं सकती थी, इसलिए अदालत के सामने उसकी गवाही दर्ज कराना एक जटिल कानूनी चुनौती थी। सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने एक साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट (सांकेतिक भाषा विशेषज्ञ) की मदद ली। जब तकनीकी और शारीरिक अंगों से जुड़े सवालों को पूछने में कठिनाई आई, तो अदालत ने एक संवेदनशील और अनूठा रास्ता अपनाया। कोर्ट रूम में एक प्लास्टिक की गुड़िया मंगवाई गई। पीड़िता ने उस गुड़िया के माध्यम से इशारों-इशारों में पूरी वारदात को दोहराया और बताया कि आरोपी ने उसके साथ क्या गलत किया था। इसी मर्मस्पर्शी और ठोस गवाही के आधार पर निचली अदालत ने आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायमूर्ति ने कहा कि केवल मूक-बधिर होने के आधार पर किसी गवाह की बात को नकारा नहीं जा सकता। कानून की नजर में संकेतों और इशारों के माध्यम से दी गई जानकारी भी ‘मौखिक साक्ष्य’ (Oral Evidence) की श्रेणी में आती है। कोर्ट ने पीड़िता की गवाही को पूरी तरह भरोसेमंद माना और कहा कि एक पीड़ित के दर्द को समझने के लिए शब्दों की नहीं, बल्कि सत्यता की आवश्यकता होती है।
सिर्फ गवाही ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक साक्ष्यों ने भी आरोपी के खिलाफ शिकंजा कसने में बड़ी भूमिका निभाई। मेडिकल जांच और फॉरेंसिक (FSL) रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि की कि पीड़िता के साथ यौन शोषण हुआ था। जांच के दौरान पीड़िता के स्लाइड्स और आरोपी के कपड़ों पर मानव शुक्राणु पाए गए थे। जब अदालत ने आरोपी से इन वैज्ञानिक तथ्यों पर स्पष्टीकरण मांगा, तो उसके पास कोई जवाब नहीं था। इन पुख्ता सबूतों ने साबित कर दिया कि आरोपी ही इस अपराध का मुख्य सूत्रधार है।
हाईकोर्ट ने आरोपी नीलम कुमार देशमुख को आईपीसी की धारा 376(2) के तहत प्राकृतिक मृत्यु होने तक उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके अतिरिक्त, घर में अवैध प्रवेश (धारा 450) के लिए 5 साल की जेल और कुल 21 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। यह फैसला समाज में एक कड़ा संदेश देता है कि दिव्यांगों की सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका बेहद गंभीर है। आरोपी फिलहाल जेल में बंद है और अब उसे अपना पूरा जीवन सलाखों के पीछे ही गुजारना होगा।
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