Naxalism in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षाबलों द्वारा एक निर्णायक अभियान चलाया जा रहा है। केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित 31 मार्च तक नक्सलवाद के खात्मे की समयसीमा जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, बस्तर अंचल में सुरक्षाबलों की सक्रियता और तेज हो गई है। जवान न केवल माओवादी नेताओं और कैडरों की धरपकड़ कर रहे हैं, बल्कि उन्हें मुख्यधारा में लौटने और आत्मसमर्पण करने के लिए भी प्रेरित कर रहे हैं। इस अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नक्सलियों द्वारा स्थापित किए गए उनके स्मारकों को नष्ट करना है, जो दशकों से इस क्षेत्र में भय और हिंसा के प्रतीक बने हुए थे।
मिशन मोड पर माओवादी प्रतीकों का खात्मा
सुरक्षाबल अब ‘लेफ्ट-विंग एक्सट्रीमिज्म’ (LWE) के भौतिक प्रतीकों को मिटाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वर्षों से भाकपा (माओवादी) द्वारा अपने मारे गए शीर्ष नेताओं और कमांडरों की याद में बनाए गए ‘मेमोरियल्स’ को मिशन मोड पर ध्वस्त किया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नक्सलवाद से मुक्त हो रहे गांवों को उनके हिंसक और अशांत अतीत की याद न आए। सरकार का मानना है कि इन संरचनाओं का विनाश ग्रामीणों के मन में सुरक्षा की भावना पैदा करने और माओवादियों के वैचारिक प्रभाव को जड़ से मिटाने के लिए आवश्यक है।
अमित शाह की समीक्षा और 15 दिनों में 53 स्मारकों पर कार्रवाई
इस व्यापक कार्रवाई की रूपरेखा 8 फरवरी को रायपुर में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा की गई उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में तैयार की गई थी। गृहमंत्री के कड़े निर्देशों के बाद, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) ने पिछले 15 दिनों के भीतर सुकमा, बीजापुर और बस्तर जिलों में नक्सलियों के 53 स्मारकों को मिट्टी में मिला दिया है। सुरक्षाबलों ने स्थानीय लोगों की सहायता से इन स्मारकों की सटीक लोकेशन-मैपिंग की है और फरवरी के अंत तक बस्तर संभाग के सभी नक्सली स्मारकों को गिराने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
पिरामिडनुमा ढांचे और भविष्य में वृक्षारोपण की योजना
सीआरपीएफ के सूत्रों के अनुसार, पिछले दो हफ्तों में जिन स्मारकों को ध्वस्त किया गया है, वे कंक्रीट से बनी पिरामिड या पगोडा जैसी आकृतियाँ थीं। इनमें से कई ढांचों पर भाकपा (माओवादी) के दरांती और हथौड़े वाले निशान बने हुए थे। दिलचस्प बात यह है कि बल केवल इन ढांचों को गिरा ही नहीं रहा है, बल्कि इन साफ किए गए स्थानों पर ‘प्लांटेशन ड्राइव’ (वृक्षारोपण अभियान) चलाने की भी योजना है। इससे उन स्थानों को हिंसा के स्मारकों के बजाय हरियाली और शांति के केंद्र में बदला जा सकेगा।
शीर्ष नेताओं के खात्मे के बाद टूटी माओवादियों की कमर
नष्ट किए गए स्मारकों में वे ‘मेमोरियल’ भी शामिल थे जो मई 2025 में नारायणपुर में मारे गए जनरल सेक्रेटरी नंबल्ला केशव राव उर्फ बसवराजू और जनवरी 2025 में गरियाबंद में ढेर हुए सेंट्रल कमेटी सदस्य रामचंद्र प्रताप रेड्डी उर्फ चलपति की याद में बनाए गए थे। इन शीर्ष माओवादियों का अंत सुरक्षाबलों के लिए बड़ी सफलता थी। सीआरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इन प्रतीकों को हटाने से आदिवासियों के मन से माओवादियों का डर खत्म हो रहा है। जब ग्रामीण अपने सामने इन अवैध ढांचों को गिरते देखते हैं, तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति विश्वास जागता है।
भयमुक्त बस्तर और माओवाद के अंत का स्पष्ट संदेश
सुरक्षा अधिकारियों का तर्क है कि स्मारकों का ध्वस्तीकरण नक्सलियों के समर्थकों या बचे हुए कैडरों के लिए किसी भी संभावित ‘रैली पॉइंट’ (एकजुट होने का स्थान) की गुंजाइश को खत्म कर देता है। अधिकारी ने कहा कि जब इन स्मारकों को धूल में मिलाया जाता है और नक्सलियों की ओर से कोई प्रतिरोध नहीं होता, तो जनता के बीच यह संदेश साफ जाता है कि माओवाद अब अपने अंतिम चरण में है। यह कार्रवाई बस्तर के सामाजिक और मानसिक ढांचे को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे आने वाली पीढ़ियां हिंसा के साये से दूर रह सकेंगी।
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