छत्तीसगढ़

Naxalism Deadline: छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद का खात्मा, 31 मार्च की डेडलाइन पर सरकार और कांग्रेस में तकरार, क्रेडिट लेने की होड़!

Naxalism Deadline: छत्तीसगढ़ में माओवाद के अंतिम प्रहार को लेकर सियासत पूरी तरह गरमा गई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने एक बार फिर दोहराया है कि राज्य सरकार आगामी 31 मार्च तक प्रदेश को सशस्त्र नक्सलवाद से मुक्त करने के अपने लक्ष्य पर अडिग है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की दृढ़ इच्छाशक्ति के अनुरूप बस्तर के अंदरूनी इलाकों में सुरक्षा बल निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं। इसी कड़ी में कुख्यात नक्सली कमांडर पापा राव का अपने 18 साथियों के साथ आत्मसमर्पण करना सरकार की ‘विकास और विश्वास’ की रणनीति की एक बड़ी जीत मानी जा रही है। मुख्यमंत्री के अनुसार, बड़े कैडर्स का मुख्यधारा में लौटना संगठन के बिखरने का स्पष्ट संकेत है।

कांग्रेस का तीखा पलटवार: एनएसजी सुरक्षा पर उठाए गंभीर सवाल

विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार के इन दावों को केवल ‘बयानबाजी’ करार देते हुए कड़े सवाल खड़े किए हैं। छत्तीसगढ़ कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने एक बेहद तकनीकी और राजनीतिक तर्क पेश करते हुए कहा कि जब तक राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को एनएसजी (NSG) सुरक्षा मिली हुई है, तब तक यह दावा कैसे किया जा सकता है कि नक्सलवाद खत्म हो गया है? कांग्रेस का कहना है कि सुरक्षा इनपुट और खतरों के आधार पर ही किसी नेता को इतनी उच्च स्तरीय सुरक्षा दी जाती है। अगर खतरा अब भी बरकरार है, तो सरकार द्वारा ‘नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़’ का ढिंढोरा पीटना जनता को गुमराह करने जैसा है।

7 साल बाद भी सुरक्षा का घेरा: खतरे के इनपुट पर बहस

कांग्रेस ने तर्क दिया कि डॉ. रमन सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटे हुए 7 साल से अधिक का समय बीत चुका है। इसके बावजूद उनकी सुरक्षा कम न होना इस बात का प्रमाण है कि खुफिया एजेंसियों के पास अभी भी नक्सली हमलों के ठोस इनपुट मौजूद हैं। सुशील आनंद शुक्ला ने तंज कसते हुए पूछा कि क्या सरकार यह गारंटी दे सकती है कि बस्तर के सुदूर अंचलों में अब हिंसा की कोई भी अप्रिय घटना नहीं होगी? विपक्षी दल का मानना है कि नक्सलवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सरकार को केवल तारीखें तय करने के बजाय जमीन पर पारदर्शी आंकड़े और सुरक्षा मापदंड साझा करने चाहिए।

बस्तर में बदलती तस्वीर और पापा राव का सरेंडर

नक्सल उन्मूलन की दिशा में सरकार जिस ‘डेडलाइन’ की बात कर रही है, उसमें पापा राव का सरेंडर एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। 25 लाख के इनामी इस कमांडर ने दशकों तक बस्तर में आतंक का साम्राज्य चलाया था। मुख्यमंत्री साय ने इसे नक्सलवाद के खिलाफ चल रही ‘डबल इंजन’ सरकार की सफलता बताया है। सरकार का मानना है कि जब शीर्ष नेतृत्व ही हथियार डाल रहा है, तो निचले स्तर के लड़ाकों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है। पुलिस का दावा है कि अब केवल कुछ ही इलाके बचे हैं जहाँ नक्सलियों की उपस्थिति है, जिन्हें समय सीमा के भीतर निष्प्रभावी कर दिया जाएगा।

राजनीतिक और सुरक्षा के मोर्चे पर भविष्य की चुनौती

नक्सल मुद्दे पर जारी इस जुबानी जंग से यह साफ है कि आने वाले दिनों में यह विषय छत्तीसगढ़ की राजनीति के केंद्र में रहेगा। जहाँ एक ओर सरकार अपनी उपलब्धियों को गिनाते हुए 31 मार्च को एक ऐतिहासिक दिन बनाने की तैयारी में है, वहीं विपक्ष इसे ‘सुरक्षा मानकों’ की कसौटी पर कस रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल हथियारों का खात्मा ही काफी नहीं है, बल्कि बस्तर के आदिवासियों के मन से भय को निकालना और वहां बुनियादी सुविधाएं पहुँचाना ही वास्तविक ‘नक्सल मुक्ति’ होगी। अब देखना यह होगा कि 31 मार्च के बाद छत्तीसगढ़ की सुरक्षा स्थिति में कितना गुणात्मक बदलाव आता है।

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