Chhattisgarh Development
Chhattisgarh Development: छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर स्थित दंतेवाड़ा जिले का बड़ेपल्ली गांव आज के आधुनिक युग में भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। आजादी के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यहाँ की तस्वीर नहीं बदली है। सड़क, बिजली, पानी और पक्के पुल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का अभाव इस गांव की नियति बन चुका है। बैलाडीला की समृद्ध लौह अयस्क पहाड़ियों की ओट में बसा यह गांव व्यवस्था की अनदेखी का जीवंत उदाहरण है। यहाँ के ग्रामीणों के लिए विकास केवल चुनावी वादों और सरकारी कागजों तक ही सीमित रहा है, जबकि धरातल पर संघर्ष की लंबी लकीरें आज भी साफ दिखाई देती हैं।
दशकों तक नक्सली प्रभाव में रहने के कारण दंतेवाड़ा के इस अंदरूनी इलाके में विकास की गति पूरी तरह थमी रही। सुरक्षा कारणों और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों का हवाला देकर प्रशासन ने यहाँ बुनियादी ढांचे के निर्माण से दूरी बनाए रखी। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वर्षों के नक्सल संघर्ष ने उन्हें मुख्यधारा से काट दिया। सरकारी योजनाएं इस गांव की दहलीज तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर शिक्षा तक, हर मोर्चे पर यहाँ के आदिवासी समुदाय को केवल निराशा ही हाथ लगी है, जिससे व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास डगमगा रहा है।
बड़ेपल्ली और नयापारा के बीच संपर्क स्थापित करने के लिए कोई सरकारी पक्का पुल मौजूद नहीं है। मजबूरी में ग्रामीणों ने अपनी सूझबूझ से लोहे के तारों और लकड़ी के फट्टों का इस्तेमाल कर एक ‘जुगाड़ का पुल’ तैयार किया है। यह अस्थायी ढांचा इतना जर्जर और असुरक्षित है कि इस पर चलते समय पूरा पुल थरथराने लगता है। नीचे बहती नदी और ऊपर झूलता यह पुल किसी भी वक्त बड़े हादसे को न्योता दे सकता है। इसके बावजूद, गांव के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के पास आवाजाही के लिए इस जानलेवा रास्ते के अलावा दूसरा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।
हैरानी की बात यह है कि केवल ग्रामीण ही नहीं, बल्कि सरकारी सेवा प्रदाता जैसे आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी इसी अस्थाई पुल के सहारे अपनी ड्यूटी निभाने को मजबूर हैं। गर्भवती महिलाओं को टीकाकरण के लिए ले जाना हो या छोटे बच्चों तक पोषण आहार पहुँचाना, हर काम में जान का जोखिम बना रहता है। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा पर सवाल उठाती है, बल्कि छत्तीसगढ़ सरकार के उन दावों की भी पोल खोलती है जिनमें अंतिम व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुँचाने की बात कही जाती है।
बड़ेपल्ली के आदिवासियों की मुश्किलें पुल तक ही सीमित नहीं हैं। दैनिक उपयोग की वस्तुओं, जैसे नमक, तेल और राशन के लिए उन्हें आज भी 35 से 40 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर किरंदुल बाजार जाना पड़ता है। परिवहन के साधनों के अभाव में बीमार मरीजों को खाट पर लादकर मीलों चलना यहाँ की कड़वी सच्चाई है। पेयजल की समस्या भी विकराल है; साफ पानी के अभाव में ग्रामीण झरिया और नालों का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे मौसमी बीमारियों का खतरा सदैव बना रहता है।
जब देश वैश्विक स्तर पर ‘विश्व गुरु’ बनने और डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ने का दावा करता है, तब बड़ेपल्ली जैसी बस्तियों की बदहाली इन दावों को कटघरे में खड़ा करती है। क्या विकास का पहिया केवल शहरों तक ही सीमित रहेगा? दक्षिण बस्तर के इन सुदूर अंचलों में रहने वाले आदिवासियों के मौलिक अधिकारों का हनन कब तक होता रहेगा? प्रशासन को अब आश्वासनों और सर्वे से ऊपर उठकर ठोस धरातलीय कार्रवाई करनी होगी, ताकि बड़ेपल्ली के नागरिकों को भी गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन मिल सके।
Read More : Hindu New Year 2083 : चैत्र प्रतिपदा पर करें ये 5 महाउपाय, पूरे साल बरसेगी सुख-समृद्धि
Dhurandhar 2 Review: भारतीय सिनेमा के प्रशंसकों के लिए 19 मार्च 2026 की तारीख किसी…
Attachment Over : छत्तीसगढ़ शासन के सख्त निर्देशों के बाद सरगुजा संभाग के स्वास्थ्य विभाग…
New IRGC Leadership: भारतीय पौराणिक आख्यानों में 'रक्तबीज' नाम के एक ऐसे असुर का वर्णन…
Iran Spy Network: ईरान के कद्दावर नेता अली लारीजानी की हत्या के बाद तेहरान ने…
Pakistan Minority Oppression: पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर हिंदू और ईसाई परिवारों के लिए अस्तित्व…
Trump Iran Threat: मिडिल ईस्ट में जारी भीषण रक्तपात और ईरान के शीर्ष नेतृत्व के…
This website uses cookies.