Chhattisgarh water crisis
Chhattisgarh water crisis : इंदौर में दूषित पेयजल के कारण उपजे गंभीर संकट और जन-आक्रोश ने छत्तीसगढ़ शासन को भी पूरी तरह अलर्ट मोड पर ला दिया है। प्रदेश में पेयजल आपूर्ति की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए नगरीय प्रशासन विभाग ने कमर कस ली है। शासन ने राज्य के सभी नगरीय निकायों को तत्काल प्रभाव से पेयजल की गुणवत्ता जांचने और विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।
नगरीय प्रशासन विभाग को पिछले पांच महीनों के दौरान प्रदेश के 14 नगर निगमों के अंतर्गत आने वाले 147 वार्डों से दूषित पानी की आपूर्ति की शिकायतें प्राप्त हुई थीं। इन शिकायतों की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने पहले ही एक कार्ययोजना तैयार की थी, लेकिन इंदौर की हालिया घटना ने इस मामले में और तेजी ला दी है। शासन अब पुरानी शिकायतों के निवारण और पाइपलाइन की वर्तमान स्थिति को लेकर कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। सूत्रों के अनुसार, सभी 192 नगरीय निकायों से उन क्षेत्रों का विशिष्ट डेटा मांगा गया है जहाँ गर्मी के मौसम में पाइपलाइन सूखने या गंदा पानी आने की समस्या बनी रहती है।
आंकड़ों के अनुसार, रायपुर के 21 वार्ड, बिलासपुर के 8, चरोदा के 14, रिसाली के 13, भिलाई के 23 और दुर्ग के 5 वार्डों को ‘संवेदनशील’ माना गया है। इन क्षेत्रों में करीब 208.57 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के विस्तार और पुराने पाइपों को बदलने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। शासन ने इस भारी-भरकम प्रोजेक्ट को दिसंबर 2025 तक पूर्ण करने की समय-सीमा तय की है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति से बचा जा सके।
हैरानी की बात यह है कि पिछले एक दशक में प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए लगभग 12 हजार करोड़ रुपये की भारी राशि खर्च की जा चुकी है। वर्तमान में भी 500 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट्स प्रगति पर हैं। इतनी बड़ी धनराशि खर्च होने के बावजूद, निकायों के पास ‘रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम’ का अभाव है। इसका अर्थ यह है कि प्रशासन को यह पता ही नहीं चल पाता कि पाइपलाइन के अंतिम छोर तक पहुंचने वाला पानी वास्तव में पीने योग्य है या नहीं।
पाइपलाइनों में होने वाले लीकेज समय पर पता न चल पाना एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। अक्सर पाइपलाइन फटने या लीकेज होने के कारण नालियों का प्रदूषित पानी पेयजल आपूर्ति में मिल जाता है, जो सीधे लोगों के घरों तक पहुंच रहा है। हालांकि, अधिकारी दावा करते हैं कि जल शोधन संयंत्रों (WTP) में पानी की तीन स्तरों—स्रोत, टंकी और वितरण—पर जांच की जाती है, लेकिन धरातल पर लीकेज के कारण यह शुद्धता प्रभावित हो रही है।
अपर संचालक पुलक भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया है कि बिलासपुर, भिलाई और दुर्ग जैसे बड़े शहरों में अब ‘स्काडा’ (SCADA) तकनीक अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इस आधुनिक तकनीक की सहायता से पाइपलाइन में होने वाले किसी भी लीकेज या प्रेशर में कमी का तुरंत पता लगाया जा सकेगा। इससे न केवल पानी की बर्बादी रुकेगी, बल्कि दूषित जल की आपूर्ति की संभावना भी शून्य हो जाएगी। शासन का लक्ष्य अब केवल पानी पहुंचाना नहीं, बल्कि हर नल तक शुद्ध और सुरक्षित जल सुनिश्चित करना है।
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