US-Iran Ceasefire
US-Iran Ceasefire : चीन ने आधिकारिक तौर पर ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए दो सप्ताह के युद्धविराम समझौते का पुरजोर स्वागत किया है। बीजिंग में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि चीन हमेशा से ही वैश्विक विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने और युद्धविराम का पक्षधर रहा है। हालांकि, चीन ने इस समझौते को लेकर ईरान के साथ किसी भी प्रत्यक्ष गुप्त वार्ता की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन यह स्पष्ट किया कि क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए बीजिंग अपने स्तर पर निरंतर प्रयास कर रहा था। प्रवक्ता ने पाकिस्तान और अन्य मध्यस्थ देशों की भूमिका की भी सराहना की, जिन्होंने इस तनाव को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए चीन और पाकिस्तान ने एक साझा रणनीति तैयार की है। दोनों देशों ने कुछ दिन पहले ही ‘पांच सूत्रीय प्रस्ताव’ पेश किया था, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में स्थायी शांति बहाल करना है। इस प्रस्ताव के मुख्य बिंदुओं में शत्रुता का तत्काल अंत, जल्द से जल्द औपचारिक शांति वार्ता की शुरुआत, गैर-सैन्य और नागरिक ठिकानों की पूर्ण सुरक्षा, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की निर्बाध आवाजाही की गारंटी और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की सर्वोच्चता को बनाए रखना शामिल है। चीन का मानना है कि इन पांच स्तंभों पर अमल करके ही भविष्य के बड़े संकटों को टाला जा सकता है।
राजनीतिक गलियारों और अंतरराष्ट्रीय सूत्रों की मानें तो ईरान को युद्धविराम की मेज पर लाने में चीन की पर्दे के पीछे की भूमिका सबसे अहम रही है। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस बात के संकेत दिए थे कि चीन ने तेहरान को मनाने में प्रभाव डाला है। दरअसल, इस सीजफायर में चीन का अपना बड़ा आर्थिक हित छुपा है। चीन, ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार होने के साथ-साथ ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है। युद्ध के कारण तेल की आपूर्ति बाधित हो रही थी, जिससे चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा था। होर्मुज जलडमरूमध्य का सामान्य होना चीन के लिए अनिवार्य है ताकि उसे रियायती दरों पर मिलने वाले कच्चे तेल की सप्लाई निर्बाध रूप से मिलती रहे।
यह पहली बार नहीं है जब चीन ने खाड़ी क्षेत्र में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। करीब तीन साल पहले सऊदी अरब और ईरान के बीच ऐतिहासिक सुलह कराने में भी बीजिंग का प्रमुख हाथ था। विशेषज्ञों का मानना है कि 40 दिनों तक चले इस ताजा संघर्ष के बाद अब खाड़ी देशों का नजरिया बदल रहा है। ईरान ने यह साबित कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव के बावजूद सैन्य रूप से डटा रह सकता है। ऐसे में खाड़ी देश अब केवल अमेरिका की ‘सुरक्षा गारंटी’ पर निर्भर रहने के बजाय एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे पर विचार कर रहे हैं, जिसमें चीन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाली है।
कुल मिलाकर, अमेरिका-ईरान युद्धविराम न केवल वैश्विक सुरक्षा के लिए अच्छा है, बल्कि यह चीन की कूटनीतिक जीत के रूप में भी देखा जा रहा है। चीन ने अपनी ‘रचनात्मक भूमिका’ के जरिए यह संदेश दिया है कि वह मध्य पूर्व के मामलों में एक अनिवार्य खिलाड़ी बन चुका है। अब दुनिया की नजरें 10 अप्रैल को होने वाली वार्ता पर टिकी हैं, जहाँ चीन और पाकिस्तान की मध्यस्थता का असली इम्तिहान होगा। यदि यह शांति अस्थायी के बजाय स्थायी रूप लेती है, तो वैश्विक कूटनीति में बीजिंग का कद और भी बढ़ जाएगा।
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