मनोरंजन

Gyan Sahay death: दिग्गज सिनेमैटोग्राफर ज्ञान सहाय का निधन, ‘अंताक्षरी’ और ‘गांधी’ जैसे प्रोजेक्ट्स से बनाई थी खास पहचान

Gyan Sahay death:  भारतीय मनोरंजन उद्योग से एक अत्यंत हृदयविदारक समाचार सामने आया है। टेलीविजन और सिनेमा की दुनिया में अपनी विजुअल कला का जादू बिखेरने वाले प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर और फिल्मकार ज्ञान सहाय का निधन हो गया है। जैसे ही उनके देहावसान की खबर सार्वजनिक हुई, पूरी फिल्म इंडस्ट्री और टीवी जगत में शोक की लहर दौड़ गई। ज्ञान सहाय न केवल अपने असाधारण तकनीकी कौशल के लिए जाने जाते थे, बल्कि वे अपने बेहद मिलनसार और सौम्य स्वभाव के लिए भी सहकर्मियों के बीच काफी लोकप्रिय थे। उनके जाने से भारतीय फिल्म जगत ने एक ऐसा स्तंभ खो दिया है जिसकी कमी को पूरा करना नामुमकिन होगा।

FTII पुणे से शुरू हुआ सफर: भारतीय टीवी में तकनीकी क्रांति के अग्रदूत

ज्ञान सहाय के प्रोफेशनल सफर की जड़ें भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (FTII), पुणे से जुड़ी थीं। वे 1975 बैच के एक मेधावी छात्र थे। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने भारतीय टेलीविजन को अपना कार्यक्षेत्र चुना और वहां कई नई तकनीकों को पेश किया। उन्हें भारत के उन शुरुआती सिनेमैटोग्राफरों में गिना जाता है जिन्होंने देश में लाइव शो और गेम शो के लिए ‘मल्टी कैमरा सेटअप’ की शुरुआत की थी। उस दौर में जब तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी, सहाय ने अपनी दूरदर्शिता से टेलीविजन के प्रोडक्शन स्तर को एक नई ऊंचाई पर पहुँचाया।

‘देख भाई देख’ से ‘साराभाई’ तक: कालजयी शोज को दी विजुअल पहचान

ज्ञान सहाय ने भारतीय टेलीविजन के कुछ सबसे यादगार और कल्ट क्लासिक शोज को अपनी विजुअल फ्रेमिंग से संवारा था। उनके द्वारा विजुअलाइज किए गए शोज आज भी दर्शकों के दिलों में बसे हैं। इनमें सुपरहिट कॉमेडी शो ‘देख भाई देख’, मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’, संगीत का महामंच ‘सा रे गा मा पा’ और घर-घर में लोकप्रिय ‘क्लोज अप अंताक्षरी’ जैसे नाम शामिल हैं। इन सभी शोज को एक अलग विजुअल पहचान देने और फ्रेमिंग के जरिए कहानी को जीवंत बनाने का श्रेय पूरी तरह ज्ञान सहाय को जाता है।

बड़े पर्दे पर निर्देशन का जादू: ‘सर आंखों पर’ और ‘कालचक्र’ जैसी फिल्में

ज्ञान सहाय की प्रतिभा केवल छोटे पर्दे तक सीमित नहीं थी; उन्होंने बड़े पर्दे पर भी अपनी गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने फिल्म ‘सर आंखों पर’ और ‘कालचक्र’ जैसी फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया था। उनके निर्देशन में एक खास तरह की संवेदनशीलता और तकनीकी शुद्धता नजर आती थी। एक फिल्मकार के तौर पर उन्होंने हमेशा गुणवत्तापूर्ण सिनेमा को प्राथमिकता दी। उनके काम की सराहना न केवल दर्शकों ने की, बल्कि आलोचकों ने भी उन्हें भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण शिल्पकार माना।

प्रतिष्ठित सम्मान और जूरी सेवाएं: राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में निभाई अहम भूमिका

अपनी असाधारण सेवाओं के लिए ज्ञान सहाय को करियर में कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। उनकी विशेषज्ञता के कारण उन्हें देश के सबसे सम्मानित पुरस्कारों के जूरी पैनल का हिस्सा बनने का गौरव भी प्राप्त हुआ। सहाय ने साल 2016 और 2019 में ‘नेशनल फिल्म अवार्ड्स’ (राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार) के जूरी सदस्य के रूप में काम किया था। इसके अलावा, वे 2017 से 2020 तक ‘Lifft India Filmotsav-World Cine Fest’ में भी जूरी के सदस्य रहे। उन्होंने ITA अवार्ड्स और RAPA अवार्ड्स में भी अपनी विशेषज्ञ सेवाएं प्रदान कीं।

सिनेमैटोग्राफी के एक अध्याय का अंत: अपूरणीय क्षति

ज्ञान सहाय के निधन के साथ ही भारतीय सिनेमैटोग्राफी और टेलीविजन प्रोडक्शन का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया है। उन्होंने जिस लगन और मेहनत से भारतीय मीडिया की विजुअल भाषा को गढ़ा, वह आने वाली पीढ़ियों के सिनेमैटोग्राफरों के लिए एक पाठ्यपुस्तक की तरह रहेगा। उनके योगदान ने न केवल तकनीकी रूप से इंडस्ट्री को समृद्ध किया, बल्कि कलाकारों को भी फ्रेम में बेहतर दिखने में मदद की। भारतीय सिनेमा उनके इस अतुलनीय योगदान को हमेशा कृतज्ञता के साथ याद रखेगा।

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