Cloudburst Kishtwar: जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ ज़िले में गुरुवार दोपहर चशोटी गांव में बादल फटने से भारी तबाही मच गई। हादसा दोपहर 12:30 बजे हुआ, जब मचैल माता यात्रा के लिए हजारों श्रद्धालु पड्डर सब-डिवीजन में चशोटी गांव में जुटे हुए थे। यह वही स्थान है जहाँ से यात्रा की शुरुआत होती है। फिलहाल तक 38 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जिनमें 2 CISF जवान भी शामिल हैं। 200 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।
तेज बारिश के बाद अचानक फटा बादल श्रद्धालुओं पर कहर बनकर टूटा। पहाड़ों से आए मलबे और पानी की चपेट में आकर श्रद्धालुओं की बसें, टेंट, लंगर और अस्थायी दुकानें बह गईं। हादसे के वक्त हजारों लोग यात्रा शुरू करने की तैयारी में लगे हुए थे। अब तक 65 लोगों को रेस्क्यू किया गया है, जबकि 28 शव बरामद किए जा चुके हैं।
प्रशासन के मुताबिक, हादसे में 100 से अधिक लोग घायल हुए हैं, जिनमें से 37 की हालत गंभीर बताई जा रही है। इन्हें किश्तवाड़ जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वहीं, पाडर के उप-जिला अस्पताल में 70 से 80 अन्य घायलों का इलाज चल रहा है। स्थानीय प्रशासन, एनडीआरएफ, आर्मी और SDRF की टीमें मौके पर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी हुई हैं।
मचैल माता यात्रा हर साल अगस्त महीने में आयोजित होती है और इसमें देशभर से हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं। यह यात्रा 25 जुलाई से 5 सितंबर तक चलेगी। जम्मू से किश्तवाड़ तक की 210 किलोमीटर लंबी यात्रा के बाद, पड्डर से चशोटी तक 19.5 किमी वाहन मार्ग है और इसके बाद 8.5 किमी की पैदल चढ़ाई होती है।
यह हादसा ऐसे समय में हुआ जब श्रद्धालुओं की संख्या चरम पर थी और चशोटी गांव में भारी भीड़ मौजूद थी। बादल फटने की जगह ठीक वही स्थान था जहाँ यात्रा का पहला पड़ाव और अस्थायी शिविर लगाए गए थे।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने त्वरित राहत कार्य शुरू कर दिए हैं। हेलीकॉप्टर और ड्रोन के माध्यम से लापता लोगों की तलाश जारी है। राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को 2 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) ने लोगों से अपील की है कि वे यात्रा स्थलों पर न जाएं जब तक हालात सामान्य न हों।
किश्तवाड़ का यह हादसा मचैल माता यात्रा के इतिहास का सबसे बड़ा त्रासदीपूर्ण मोड़ बन गया है। श्रद्धालुओं की जान-माल की भारी क्षति और लापता लोगों की बड़ी संख्या ने यात्रा की सुरक्षा और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में राहत और पुनर्वास कार्य प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती बनेंगे।
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