Colonel Sophia Qureshi Case: कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार के ढुलमुल रवैये पर सख्त नाराजगी जाहिर की है। विशेष जांच दल (SIT) ने अदालत को सूचित किया कि उसने राज्य के मंत्री विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलाने (अभियोजन) की औपचारिक अनुमति मांगी थी, लेकिन सरकार ने महीनों बीत जाने के बाद भी इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस देरी पर हैरानी जताते हुए कहा कि न्याय प्रक्रिया में इस तरह की सुस्ती स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब एक जांच एजेंसी अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है, तो सरकार को उस पर तत्काल कदम उठाने चाहिए थे।
ऑपरेशन सिंदूर और विवाद की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा मामला?
यह पूरा विवाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद शुरू हुआ था। कर्नल सोफिया कुरैशी ने इस ऑपरेशन को लेकर मीडिया को ब्रीफिंग दी थी, जिसके बाद मंत्री विजय शाह ने उनके खिलाफ एक आपत्तिजनक बयान दिया था। इस टिप्पणी को सेना के एक अधिकारी की गरिमा के खिलाफ मानते हुए उनके विरुद्ध प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई थी। विजय शाह ने इसी एफआईआर को रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हालांकि, एसआईटी की जांच में मंत्री के खिलाफ पुख्ता सबूत पाए गए हैं, जिसके आधार पर जांच एजेंसी ने सरकार से मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी है।
समय का हवाला और सीजेआई की तीखी टिप्पणी: “19 अगस्त से अब तक क्या किया?”
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तारीखों का उल्लेख करते हुए राज्य सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, “आप 19 अगस्त 2025 से एसआईटी की रिपोर्ट पर कुंडली मारकर बैठे हैं और आज 19 जनवरी 2026 हो गई है। इतने महीनों में सरकार किसी निर्णय पर क्यों नहीं पहुँच सकी?” राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि रिपोर्ट पर विचार चल रहा था, जिसे सीजेआई ने खारिज कर दिया। अदालत ने यह भी नोट किया कि एसआईटी ने सीलबंद लिफाफे में जो रिपोर्ट दी थी, उसमें कई गंभीर पहलुओं की जांच की गई है, हालांकि याचिकाकर्ता के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को इसमें शामिल नहीं किया गया था।
‘मगरमच्छ के आंसू’ और माफीनामा: कोर्ट ने दलीलों को किया खारिज
विजय शाह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल ने सार्वजनिक रूप से माफी मांग ली है और वे जांच में पूरा सहयोग कर रहे हैं। इस पर सीजेआई ने सख्त लहजे में कहा, “आपका माफीनामा रिकॉर्ड पर कहाँ है? अब बहुत देर हो चुकी है।” अदालत ने पूर्व में दी गई अपनी टिप्पणी को दोहराते हुए कहा कि विजय शाह की सार्वजनिक माफी केवल कानूनी कार्रवाई से बचने का एक जरिया है, जिसे कोर्ट पहले ही ‘मगरमच्छ के आंसू’ बताकर खारिज कर चुका है। पीठ ने उनके ऑनलाइन माफीनामे पर भी असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि माफी मांगने का एक गरिमापूर्ण तरीका होता है, जो यहाँ नहीं दिखा।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश: कानून के तहत जल्द फैसला ले सरकार
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह कानून के दायरे में रहकर अभियोजन की मंजूरी पर ‘उचित कदम’ उठाए। कोर्ट रूम में खुफिया विभाग के डीआईजी डी. कल्याण चक्रवर्ती भी मौजूद थे, जिन्हें अदालत ने उन पहलुओं पर गौर करने को कहा जिनका जिक्र अन्य संबंधित याचिकाओं में किया गया है। इस आदेश के बाद अब गेंद मध्य प्रदेश सरकार के पाले में है। यदि सरकार जल्द ही मुकदमा चलाने की अनुमति देती है, तो मंत्री विजय शाह की मुश्किलें बढ़ना तय है और उन्हें ट्रायल का सामना करना पड़ेगा।
















