Women Identity Debate : दीपिका की बेटियों के नाम में मां का सरनेम, आखिर यह परंपरा आज भी चर्चा में क्यों?

दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह की बेटियों के नाम में मां और पिता दोनों के सरनेम शामिल हैं। दुआ पादुकोण सिंह और देवी पादुकोण सिंह के नाम ने एक पुरानी सामाजिक परंपरा पर सवाल खड़े किए हैं। आखिर मां का सरनेम आज भी चर्चा का विषय क्यों बन जाता है?

Women Identity Debate : भारत में बच्चे के जन्म के बाद उसका नाम तय करना परिवार के लिए खास अवसर होता है। लेकिन सरनेम चुनने की बात आते ही अधिकतर परिवारों में पिता का उपनाम प्राथमिक विकल्प बन जाता है। ऐसे में जब बच्चे के नाम में मां और पिता दोनों के सरनेम शामिल हों, तो यह चर्चा का विषय बन जाता है। अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और अभिनेता रणवीर सिंह की बेटियों के नाम ने इसी सामाजिक सोच पर सवाल खड़े किए हैं।

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दुआ और देवी के नाम में शामिल हैं दोनों की पहचान

दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह ने अपनी छोटी बेटी का नाम देवी पादुकोण सिंह रखा है। इससे पहले उनकी बड़ी बेटी का नाम दुआ पादुकोण सिंह सामने आया था। दोनों नामों में मां का सरनेम पादुकोण और पिता का सरनेम सिंह शामिल है। देखने में यह माता-पिता की पहचान को साथ रखने का सामान्य तरीका है, लेकिन भारतीय समाज में पिता का सरनेम अधिक प्रचलित होने के कारण इस फैसले पर लोगों का ध्यान गया।

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मां का सरनेम शामिल करना अलग फैसला क्यों लगता है?

परिवार में मां और पिता दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। फिर भी बच्चे के नाम में पिता का सरनेम जोड़ना सामान्य माना जाता है, जबकि मां का सरनेम शामिल करने पर लोग उसके पीछे की वजह जानना चाहते हैं। यही अंतर सामाजिक मान्यताओं पर विचार करने का अवसर देता है। महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर सोच में बदलाव आया है, लेकिन पारिवारिक पहचान के मामले में पुरानी परंपराओं का प्रभाव अब भी दिखाई देता है।

क्या बराबरी केवल अधिकारों और अवसरों तक सीमित है?

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें अपनी पहचान स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन जब अगली पीढ़ी की पहचान तय करने की बात आती है, तब पारंपरिक मान्यताएं प्रभावी हो सकती हैं। मां का सरनेम जोड़ने से पिता की पहचान समाप्त नहीं होती। दुआ पादुकोण सिंह और देवी पादुकोण सिंह के नाम में दोनों की पहचान मौजूद है। यह उदाहरण दिखाता है कि परिवार अपनी परिस्थितियों और पसंद के अनुसार नाम चुन सकते हैं।

नीना गुप्ता और मसाबा की मिसाल

अभिनेत्री नीना गुप्ता ने अपनी बेटी मसाबा को अपना सरनेम दिया। मसाबा गुप्ता ने फैशन जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है। उनका उदाहरण बताता है कि बच्चे के नाम में मां का सरनेम शामिल करना कोई नया विचार नहीं है। हालांकि, नीना गुप्ता और दीपिका पादुकोण की पारिवारिक परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए दोनों फैसलों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती। फिर भी ये उदाहरण इस सवाल को सामने लाते हैं कि मां की पहचान को परिवार के नाम में शामिल करना असामान्य क्यों माना जाता है।

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हेमा मालिनी और श्रीदेवी की बेटियों के नाम

हिंदी सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्रियों हेमा मालिनी और श्रीदेवी ने अपने काम से स्वतंत्र पहचान बनाई। हेमा मालिनी की बेटियां ईशा देओल और अहाना देओल के नाम में देओल सरनेम है। वहीं श्रीदेवी की बेटियां जाह्नवी कपूर और खुशी कपूर पिता के सरनेम से जानी जाती हैं। इन नामों से किसी परिवार के फैसले को सही या गलत नहीं ठहराया जा सकता। ये उदाहरण केवल यह समझने में मदद करते हैं कि बच्चों के सरनेम चुनने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।

विद्या बालन ने शादी के बाद नहीं बदला अपना नाम

शादी के बाद महिलाओं द्वारा पति का सरनेम अपनाने की परंपरा भी इसी बहस से जुड़ी है। अभिनेत्री विद्या बालन ने फिल्म निर्माता सिद्धार्थ रॉय कपूर से शादी के बाद अपना नाम नहीं बदला। उन्होंने इस विषय पर सवाल उठाते हुए कहा था कि जब उनके पति अपना नाम बदलकर सिद्धार्थ बालन रॉय कपूर नहीं कर रहे, तो वह भी अपना नाम क्यों बदलें। उनका उदाहरण महिलाओं की व्यक्तिगत पहचान और शादी के बाद नाम बदलने की सामाजिक अपेक्षाओं पर चर्चा को आगे बढ़ाता है।

क्या मां का सरनेम जोड़ने से पिता की पहचान कम होती है?

बच्चे के नाम में मां का सरनेम शामिल करना पिता की पहचान को कम करने का फैसला नहीं है। इसी तरह केवल पिता का सरनेम रखना भी अपने आप में गलत नहीं है। असली मुद्दा यह है कि परिवार को नाम चुनने की स्वतंत्रता मिले और किसी एक परंपरा को अनिवार्य न माना जाए। किसी बच्चे के नाम में एक सरनेम हो या दो, उसकी पहचान और परिवार के रिश्तों का मूल्य केवल नाम से तय नहीं होता।

बेटियों को बराबरी सिखाने की शुरुआत घर से

बच्चे परिवार में बराबरी का व्यवहार देखकर सीखते हैं। वे देखते हैं कि माता-पिता के विचारों, काम और फैसलों को कितना सम्मान दिया जाता है। ऐसे में नाम में दोनों की पहचान शामिल करना कुछ परिवारों के लिए बराबरी का प्रतीक हो सकता है। हालांकि, वास्तविक समानता केवल सरनेम से नहीं आती, बल्कि घर में जिम्मेदारियों के बंटवारे, सम्मान और फैसले लेने की समान स्वतंत्रता से मजबूत होती है।

दीपिका की पसंद से समाज क्या सीख सकता है?

दीपिका और रणवीर ने अपनी बेटियों के नाम किस विशेष उद्देश्य से चुने, इस बारे में उनकी ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं है। इसलिए इसे उनकी निजी पसंद के रूप में देखना उचित है। इस घटना से निकली व्यापक बहस यह है कि मां का सरनेम जोड़ने पर विशेष चर्चा क्यों होती है। बराबरी का अर्थ यह नहीं कि हर परिवार एक ही तरीका अपनाए, बल्कि यह है कि मां, पिता या दोनों के सरनेम चुनने के विकल्प को समान सहजता से स्वीकार किया जाए।

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Chandan Das

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