Trump Xi Jinping Beijing Summit
Trump Xi Jinping Beijing Summit : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बहुप्रतीक्षित और बहुचर्चित बीजिंग दौरा बेहद कड़े कूटनीतिक ड्रामे, भव्य स्वागत और वैश्विक सुर्खियों के बीच आखिरकार समाप्त हो गया। लगभग एक दशक के लंबे अंतराल के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की यह पहली चीन यात्रा थी, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई थीं। यात्रा समाप्त होने के बाद ट्रंप ने बड़े ही गर्व के साथ सार्वजनिक मंचों से यह दावा किया कि उन्होंने और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मिलकर कई ऐसी बेहद उलझी हुई और जटिल अंतरराष्ट्रीय समस्याओं को सुलझा लिया है, जिन्हें कोई दूसरा छूने की हिम्मत भी नहीं कर सकता था।
हालांकि, दुनिया भर के राजनयिक और विशेषज्ञ इस बात को लेकर अभी भी गहरे सस्पेंस में हैं कि आखिरकार इस हाई-प्रोफाइल यात्रा से दोनों देशों को वास्तविक रूप में क्या हासिल हुआ? ट्रंप ने जिन जादुई ‘समाधानों’ का जिक्र किया, उनकी जमीनी हकीकत क्या है, इस पर उन्होंने पूरी तरह से रहस्य का पर्दा बनाए रखा।
वैश्विक मामलों के अधिकांश विशेषज्ञ और राजनीतिक रणनीतिकार इस पूरी कवायद को केवल एक सुनियोजित कूटनीतिक शो या मीडिया इवेंट मान रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि चीनी पक्ष की ओर से इस यात्रा के अंत में जारी किए गए आधिकारिक वक्तव्य में दोनों राष्ट्राध्यक्षों की आखिरी द्विपक्षीय बैठक को लेकर किसी भी ठोस या दूरगामी समझौते की जानकारी नहीं दी गई। यही मुख्य वजह है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इस बैठक को ‘गतिरोध का शिखर सम्मेलन’ (समिट ऑफ डेडलॉक) कहकर संबोधित कर रहे हैं, जहां दोनों महाशक्तियां अपनी-अपनी जिद पर अड़ी रहीं और साझा घोषणापत्र जैसी कोई बड़ी कामयाबी सामने नहीं आ सकी।
बीजिंग की धरती से विदा होने के तुरंत बाद डोनाल्ड ट्रंप ने ‘फॉक्स न्यूज’ को दिए एक विशेष साक्षात्कार में उन संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर बात की, जिन पर दोनों देशों के बीच बंद कमरों में बेहद गोपनीय चर्चा हुई थी। इस शीर्ष स्तरीय बातचीत के केंद्र में मध्य पूर्व (मिडल ईस्ट) का गहराता संकट और ईरान का परमाणु कार्यक्रम सबसे ऊपर था। वैश्विक व्यापार के लिए जीवनरेखा माने जाने वाले हॉर्मुज स्ट्रेट की संभावित नाकेबंदी और ईरान के बढ़ते परमाणु प्रभुत्व को लेकर दोनों महाशक्तियों के बीच गंभीर मंथन हुआ। ट्रंप ने साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने ईरान के विषय पर बेहद विस्तार से बात की है और इस बात पर दोनों देशों की सोच काफी हद तक एक जैसी है कि ईरान के पास किसी भी सूरत में परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए, साथ ही हॉर्मुज का समुद्री व्यापारिक मार्ग अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए हमेशा खुला रहना चाहिए।
भले ही ट्रंप ने दोनों देशों के विचारों में समानता की बात कही हो, लेकिन चीनी प्रशासन इस बात को सार्वजनिक मंचों पर स्वीकार करने या अमेरिका की खुलकर मदद करने के वादे से साफ तौर पर बच रहा है। चीनी विदेश मंत्रालय ने अपने संक्षिप्त बयान में सिर्फ इतना ही कहा कि मध्य पूर्व में किसी भी तरह का युद्ध कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था और चीन वहां स्थायी शांति स्थापित करने के लिए अपने स्तर पर अथक प्रयास कर रहा है। इसी कूटनीतिक खींचतान के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा आर्थिक कार्ड खेलते हुए संकेत दिया कि यदि चीन का रुख सहयोगात्मक रहता है, तो अमेरिका चीनी कंपनियों पर से तेल आयात से जुड़े कड़े प्रतिबंधों को हटाने या उनमें ढील देने पर गंभीरता से विचार कर सकता है।
ताइवान का संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा इस पूरी द्विपक्षीय बैठक का सबसे संवेदनशील और विस्फोटक मोड़ साबित हुआ। ट्रंप ने बातचीत के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा कि वे ताइवान को दिए जाने वाले 14 अरब डॉलर (लगभग 10.5 अरब पाउंड) के रिकॉर्ड तोड़ अमेरिकी सैन्य सहायता पैकेज को फिलहाल टालने या पूरी तरह से रद्द करने पर विचार कर रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यदि अमेरिका वास्तव में अपने इस कदम पर आगे बढ़ता है, तो यह बीजिंग की सबसे बड़ी और पुरानी मांग के आगे घुटने टेकने जैसा होगा, क्योंकि चीन हमेशा से ताइवान पर अपना पूर्ण संप्रभु दावा ठोकता आया है और अमेरिकी दखल का विरोध करता रहा है।
हालांकि, ट्रंप के इस बयान से अमेरिकी प्रशासन में पैदा हुए भ्रम को दूर करने के लिए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बीजिंग में ही प्रेस कॉन्फ्रेंस कर साफ किया कि ताइवान को लेकर अमेरिका की पारंपरिक और आधिकारिक नीति में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं हुआ है। सैन्य विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि यदि अमेरिका ताइवान के इस रक्षा पैकेज को रोकता है, तो इससे ताइवान जलडमरूमध्य क्षेत्र में चीनी आक्रमण को रोकने की अमेरिकी सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो जाएगी। खुद बैठक के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रंप को बेहद सख्त लहजे में दोटूक चेतावनी दी कि ताइवान का मुद्दा अमेरिका और चीन के आपसी संबंधों के बीच की ‘सबसे महत्वपूर्ण’ और बेहद संवेदनशील लक्ष्मण रेखा है, जिसे अमेरिका को कभी भी पार करने की धृष्टता नहीं करनी चाहिए।
व्यापार के मोर्चे पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने हमेशा की तरह अपनी चिरपरिचित शैली में दावा किया कि उन्होंने शी जिनपिंग के साथ कुछ ‘शानदार और ऐतिहासिक ट्रेड डील्स’ पर सहमति बनाई है। इस पूरे दौरे के दौरान अमेरिकी आर्थिक प्राथमिकताओं को ‘थ्री-बी’ यानी बीफ (Beef), बीन्स (Soybeans) और बोइंग (Boeings) के विशेष आर्थिक फॉर्मूले में समेटा गया था। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने सकारात्मक उम्मीद जताते हुए कहा कि चीन अगले तीन वर्षों के भीतर अमेरिका से अरबों डॉलर मूल्य के कृषि उत्पादों की बड़े पैमाने पर खरीद करेगा, जिससे अमेरिकी किसानों को सीधा आर्थिक लाभ पहुंचेगा।
इस व्यापारिक चर्चा के दौरान विमान निर्माता अमेरिकी कंपनी बोइंग को लेकर एक बहुत बड़ी और राहत देने वाली घोषणा जरूर सामने आई। इस समझौते के तहत चीन शुरुआती चरण में अमेरिका से 200 अत्याधुनिक जेट विमानों की खरीद करेगा, जिसे लेकर ट्रंप ने बाद में दावा किया कि यह ऑर्डर भविष्य में बढ़कर 750 विमानों तक भी जा सकता है। हालांकि, इन लुभावने सौदों के बावजूद दोनों महाशक्तियों के बीच पिछले कई वर्षों से चल रहे मुख्य टैरिफ वॉर (पारस्परिक सीमा शुल्क युद्ध) को हमेशा के लिए समाप्त करने की दिशा में कोई ठोस या स्थायी समझौता नहीं हो सका। पिछले वर्ष दोनों देशों के बीच हुआ अस्थायी व्यापारिक समझौता इसी वर्ष नवंबर में समाप्त होने जा रहा है, जिससे आशंका है कि आने वाले महीनों में दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव एक बार फिर से चरम पर पहुंच सकता है।
आर्थिक और औद्योगिक मोर्चे पर जहां अमेरिका का सबसे बड़ा हथियार दंडात्मक टैरिफ लगाना है, वहीं चीन के पास ‘रेयर अर्थ्स’ यानी दुर्लभ खनिजों का एक ऐसा अचूक इक्का है जो पूरी दुनिया की तकनीकी इंडस्ट्री को नियंत्रित करता है। चीन ने पिछले साल इन अति-महत्वपूर्ण खनिजों के वैश्विक निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, जिसके चलते दुनिया भर की इलेक्ट्रॉनिक और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन लगभग ठप हो गई थी। यद्यपि बाद में चीन अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर इसकी आपूर्ति को आंशिक रूप से बहाल करने पर सहमत तो हुआ था, लेकिन अमेरिकी वाणिज्यिक अधिकारियों का आरोप है कि चीन आज भी अमेरिकी कंपनियों को निर्यात लाइसेंस जारी करने में जानबूझकर प्रशासनिक देरी कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ (CFR) की वरिष्ठ आर्थिक विशेषज्ञ हीदी क्रेडो-रेडिकर ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि चीन द्वारा दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर लगाई गई पाबंदियों ने अमेरिकी और यूरोपीय आधुनिक उद्योगों की कमर तोड़कर रख दी है। आज के इस आधुनिक युग में भी अमेरिका अपने सैन्य रक्षा तंत्र, एडवांस्ड सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के निर्माण के लिए पूरी तरह से चीन के नियंत्रण वाली सप्लाई चेन पर ही निर्भर है। चीन के पास इस पूरे वैश्विक बाजार की ताला-चाबी मौजूद है और वह अमेरिकी घरेलू उद्योगों को प्रतिस्पर्धा में पछाड़ने के लिए कीमतों का खतरनाक खेल खेल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका को इस रणनीतिक मोर्चे पर पूरी तरह आत्मनिर्भर होने में अभी कई साल का लंबा वक्त लगेगा।
वहीं दूसरी ओर, वैश्विक मंचों पर हमेशा उठाए जाने वाले मानवाधिकारों के संवेदनशील मुद्दे पर ट्रंप ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए कहा कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग चीन की जेलों में हिरासत में लिए गए अमेरिकी पादरियों को मानवीय आधार पर रिहा करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच हॉन्गकॉन्ग के लोकतंत्र समर्थक और प्रसिद्ध मीडिया दिग्गज जिमी लाई का कानूनी मामला अभी भी काफी पेचीदा और तनावपूर्ण बना हुआ है। जिमी लाई को पिछले साल चीनी विरोधी गतिविधियों के आरोप में 20 साल की लंबी और सख्त सजा सुनाई गई थी, और उनका परिवार लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों सहित ट्रंप से उनकी सुरक्षित रिहाई के लिए गुहार लगा रहा है, जिस पर चीन ने कोई भी नरम रुख दिखाने से साफ इनकार कर दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप को दुनिया भर में उनकी बड़ी रैलियों और सार्वजनिक भाषणों में तय स्क्रिप्ट से पूरी तरह हटकर अनपेक्षित बोलने, विरोधियों का सरेआम मजाक उड़ाने या उन पर कड़े तंज कसने की अनूठी शैली के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बार बीजिंग की धरती पर ट्रंप का एक बेहद अनुशासित, गंभीर और बिल्कुल अलग ही कूटनीतिक रूप देखने को मिला। वे अपने पूरे पांच दिवसीय दौरे के दौरान हर आधिकारिक मंच पर बेहद संयमित और नपे-तुले नजर आए, यहां तक कि चीनी प्रशासन द्वारा आयोजित ‘स्टेट डिनर’ में दिया गया उनका भाषण भी पूरी तरह से राजनयिक मर्यादाओं के अनुरूप था।
व्हाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप इस बेहद नाजुक और महत्वपूर्ण समिट को अपने किसी भी अप्रत्याशित या अनौपचारिक बयान से खराब नहीं करना चाहते थे, क्योंकि चीनी प्रोटोकॉल अधिकारी अपनी पहले से तयशुदा बैठकों में किसी भी प्रकार के ‘सरप्राइज’ या अनपेक्षित व्यवहार को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते हैं।
इस पूरी नीरस और कूटनीतिक रूप से शुष्क यात्रा में यदि भविष्य के लिहाज से कुछ वास्तव में सकारात्मक और दूरगामी रहा, तो वह था ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) तकनीक के नियमन को लेकर दोनों देशों के बीच हुई उच्च स्तरीय बातचीत। ट्रंप ने मीडिया को बताया कि उन्होंने और जिनपिंग ने एआई के अनियंत्रित खतरों से पूरी मानवता को बचाने के लिए एक वैश्विक ‘सुरक्षा घेरा’ (सेफ्टी गार्डरेल्स) तैयार करने पर गहन चर्चा की है।
ट्रंप ने स्वीकार किया कि एआई तकनीक चिकित्सा और सैन्य अनुसंधान के क्षेत्र के लिए जितनी शानदार है, इसके जरिए जैविक, परमाणु और विनाशकारी साइबर हमलों का जोखिम भी उतना ही बड़ा है, जिसे दोनों परमाणु संपन्न देश मिलकर ही संभाल सकते हैं। फिलहाल चीनी तकनीकी कंपनियां अमेरिकी एआई चिप्स खरीदने के लिए बेहद बेताब हैं, क्योंकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका इन आधुनिक चिप्स के निर्यात की अनुमति चीन को देता है, तो चीन की एआई कंप्यूटिंग क्षमता रातों-रात तीन गुना तक बढ़ जाएगी, जो अमेरिका के लिए एक नया रणनीतिक सिरदर्द बन सकता है।
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