अंतरराष्ट्रीय

Donald Trump Greenland: ग्रीनलैंड पर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा बयान, बल प्रयोग से इनकार, मगर डेनमार्क को दी चेतावनी

Donald Trump Greenland: स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वार्षिक बैठक के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर दुनिया भर में चल रही सैन्य कार्रवाई की अटकलों पर विराम लगा दिया है। बुधवार को अपने संबोधन में ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका इस खनिज-समृद्ध द्वीप को अपने नियंत्रण में लेने के लिए किसी भी प्रकार के बल का प्रयोग नहीं करेगा। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि सैन्य शक्ति की उन्हें आवश्यकता नहीं है और वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी रणनीतिक योजनाओं को आगे बढ़ाना चाहते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा सुनिश्चित करने में केवल अमेरिका ही सक्षम है।

“हम इसे भूलेंगे नहीं”: डेनमार्क को सख्त संदेश

ट्रंप ने अपने भाषण में कूटनीतिक चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ग्रीनलैंड के मामले में अमेरिका के प्रस्ताव को ठुकराया जाता है, तो वाशिंगटन इसे याद रखेगा। उन्होंने कहा, “आप हाँ कह सकते हैं या ना, लेकिन हम इसे भूलेंगे नहीं।” ट्रंप ने इतिहास की याद दिलाते हुए कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने ही ग्रीनलैंड को बचाया और डेनमार्क को सौंपा था। उन्होंने तर्क दिया कि उस समय की तुलना में आज का अमेरिका कहीं अधिक शक्तिशाली महाशक्ति है, और सहयोगियों को अमेरिका द्वारा दशकों से दी जा रही मदद का सम्मान करना चाहिए।

यूरोप की आर्थिक स्थिति पर ट्रंप का प्रहार

अपने करीब 70 मिनट लंबे भाषण में राष्ट्रपति ट्रंप ने केवल ग्रीनलैंड ही नहीं, बल्कि यूरोपीय देशों की आर्थिक नीतियों पर भी तीखा हमला किया। उन्होंने दावा किया कि जहाँ एक ओर अमेरिका निरंतर आर्थिक प्रगति के पथ पर अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर यूरोप सही दिशा में आगे बढ़ने में विफल रहा है। उन्होंने डेनमार्क के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि उनके मन में वहां के लोगों के लिए बहुत आदर है, लेकिन रणनीतिक वास्तविकता यह है कि आर्कटिक क्षेत्र में ग्रीनलैंड की रक्षा करने की क्षमता केवल अमेरिका के पास है।

ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व: दुर्लभ खनिज नहीं, सुरक्षा है प्राथमिकता

ट्रंप ने ग्रीनलैंड को “बर्फ का एक विशाल टुकड़ा” बताते हुए कहा कि यह दुर्गम और ठंडे स्थान पर स्थित है, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका की इस द्वीप में रुचि वहां मौजूद दुर्लभ खनिजों के लिए नहीं, बल्कि रणनीतिक कारणों से है। ग्रीनलैंड, अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण बिंदु पर स्थित है। ट्रंप ने इसे वापस डेनमार्क को सौंपने के पुराने फैसले को “मूर्खता” करार दिया और कहा कि दशकों तक अमेरिका ने जो सुरक्षा और संसाधन यूरोप को दिए हैं, उसके बदले में यह एक बहुत छोटी मांग है।

यूरोपीय विस्तारवाद का दिया हवाला

अपने दावों को जायज ठहराते हुए ट्रंप ने कहा कि इतिहास में कई यूरोपीय देशों ने विभिन्न क्षेत्रों पर कब्जा किया है, इसलिए अमेरिका की इस रणनीतिक मांग में कुछ भी गलत नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों और आर्कटिक में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए अमेरिका का वहां होना अनिवार्य है। ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर अमेरिका और यूरोप के बीच भू-राजनीतिक तनाव को हवा दे दी है, जिससे नाटो सहयोगियों के बीच भविष्य के संबंधों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

कूटनीतिक युद्ध की ओर बढ़ते कदम

ट्रंप का यह बयान दर्शाता है कि भले ही वे सैन्य बल का प्रयोग न करें, लेकिन वे आर्थिक और कूटनीतिक दबाव के जरिए ग्रीनलैंड पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश जारी रखेंगे। डेनमार्क के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह अपनी संप्रभुता और अमेरिका के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखता है। आने वाले समय में ग्रीनलैंड का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बना रहेगा।

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