Trump vs NATO
Trump vs NATO: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के प्रति अपना कड़ा रुख अपनाते हुए एक बार फिर संगठन को छोड़ने की चेतावनी दी है। बुधवार को नाटो महासचिव मार्क रूट के साथ एक हाई-प्रोफाइल बैठक के बाद ट्रंप ने अपनी नाराजगी सार्वजनिक की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए लिखा कि नाटो उस वक्त अमेरिका के काम नहीं आया जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। ट्रंप का मानना है कि भविष्य में भी संकट के समय यह संगठन अमेरिका का साथ नहीं देगा। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है और नाटो की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ट्रंप और महासचिव मार्क रूट के बीच हुई बंद कमरे की बैठक काफी तनावपूर्ण रही। ट्रंप ने संगठन के प्रति अपनी पुरानी शिकायतों को दोहराते हुए कहा कि कई सदस्य देश अपनी वित्तीय जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर रहे हैं। विशेष रूप से ग्रीनलैंड के मुद्दे पर ट्रंप ने सख्त लहजे में कहा कि “बर्फ का वह बड़ा टुकड़ा बहुत बुरे तरीके से चलाया जा रहा है।” ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त हिस्सा है, ट्रंप की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं का केंद्र रहा है। उनकी इन टिप्पणियों ने महासचिव रूट को काफी असहज स्थिति में डाल दिया, क्योंकि ट्रंप ने सीधे तौर पर संगठन की एकजुटता पर प्रहार किया है।
ट्रंप की इस नाराजगी का एक प्रमुख कारण ईरान के साथ चल रहा संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा संकट है। जब ईरान ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद कर दिया और दुनिया भर में गैस की कीमतें आसमान छूने लगीं, तब ट्रंप को उम्मीद थी कि नाटो सदस्य देश अमेरिका के साथ मजबूती से खड़े होंगे। ट्रंप ने संकेत दिया कि चूंकि नाटो ने इस संकट में अमेरिका का सक्रिय समर्थन नहीं किया, इसलिए अमेरिका के लिए इस गठबंधन में बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर तय हुआ है, जिसमें जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की बात कही गई है।
अपनी आक्रामक शैली के लिए मशहूर डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर भी कड़े तेवर दिखाए हैं। उन्होंने धमकी दी है कि यदि जरूरत पड़ी तो वह ईरान के पावर प्लांट और बुनियादी ढांचों पर हमला करने से पीछे नहीं हटेंगे। ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि “आज रात पूरी सभ्यता मिट जाएगी।” व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने भी पुष्टि की है कि ट्रंप गंभीरता से नाटो से बाहर निकलने के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, 2023 में तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा पारित एक कानून के तहत, किसी भी राष्ट्रपति को नाटो छोड़ने के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेना अनिवार्य है, जो ट्रंप के लिए एक कानूनी बाधा बन सकता है।
उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) की स्थापना 1949 में सोवियत संघ के बढ़ते खतरे को देखते हुए की गई थी। इसके 32 सदस्य देशों के बीच ‘अनुच्छेद 5’ के तहत आपसी रक्षा का समझौता है, जिसके अनुसार किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है। ट्रंप लंबे समय से इस सिद्धांत के आलोचक रहे हैं, उनका तर्क है कि अमेरिका अकेले ही यूरोप की सुरक्षा का भारी बोझ उठा रहा है जबकि अन्य देश इसका लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने 9/11 के बाद की स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका ने हमेशा दूसरों की मदद की, लेकिन अब जब उसे ईरान के खिलाफ समर्थन चाहिए, तो नाटो पीछे हट रहा है।
ट्रंप की नाटो से बाहर निकलने की धमकी केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक व्यवस्था का संकेत है। यदि अमेरिका वास्तव में नाटो से अलग होता है, तो यह यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर सकता है। ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण की मांग और सदस्य देशों के साथ सैन्य सहयोग में कमी आने से रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को बढ़त मिल सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें ट्रंप के अगले कदम और अमेरिकी कांग्रेस की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं।
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