Election Commission Reply :चुनाव आयोग ने बिहार में चल रहे मतदाता सूची के “विशेष गहन पुनरीक्षण” (Special Intensive Revision) पर हो रही आलोचनाओं के बीच स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बुधवार को बयान देते हुए कहा कि एक “स्वच्छ और निष्पक्ष” मतदाता सूची किसी भी लोकतंत्र के लिए बुनियादी आवश्यकता है। उन्होंने कहा, “भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना आयोग की प्राथमिक जिम्मेदारी है।”
जहां विपक्ष इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहा है और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुका है, वहीं चुनाव आयोग इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का जरिया बता रहा है। आयोग के अनुसार, मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण “अवैध प्रवासियों” और “अयोग्य मतदाताओं” को हटाने के लिए जरूरी है ताकि केवल “योग्य भारतीय नागरिकों” को ही मतदान का अधिकार मिल सके।
मुख्य चुनाव आयुक्त ने स्पष्ट किया कि बिहार में यह प्रक्रिया एक तरह से ‘पायलट प्रोजेक्ट’ के तौर पर चल रही है, जिसे सफलता मिलने पर देश के अन्य राज्यों में भी चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। इससे पहले, विपक्षी दलों ने इस प्रक्रिया को “जन अधिकारों के खिलाफ” बताते हुए कहा था कि इससे करोड़ों लोग अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।
आयोग द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, बूथ-स्तरीय अधिकारी (BLO) मतदाताओं के घर-घर जाकर विशेष फॉर्म वितरित कर रहे हैं, जिसे नागरिकों को भरकर जरूरी दस्तावेज़ों के साथ वापस जमा करना है। इस प्रक्रिया के तहत नागरिकता प्रमाणित करने के लिए एक “स्व-सत्यापित घोषणापत्र” भी देना अनिवार्य किया गया है।
1 जुलाई 1987 से पहले का कोई सरकारी दस्तावेज़
जन्म प्रमाण पत्र
पासपोर्ट
शैक्षणिक प्रमाण पत्र
स्थायी निवास प्रमाण पत्र
वन रक्षक प्रमाण पत्र
जाति प्रमाण पत्र
एनआरसी में शामिल होने का प्रमाण
परिवार रजिस्टर
हालांकि, इन दस्तावेजों की उपलब्धता आम नागरिकों के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। खासकर ग्रामीण इलाकों, अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय और निर्धन वर्ग के लोगों के पास इनमें से अधिकांश दस्तावेज़ नहीं हैं।
आयोग की ओर से दस्तावेज़ों की जो सूची दी गई है, वह खासतौर पर समाज के हाशिए पर खड़े वर्ग के लिए भारी पड़ रही है। ऐसे लोग जो वर्षों से मतदान कर रहे हैं, अब खुद को मतदाता सूची से बाहर पाए जाने की आशंका से घिरे हैं। इनमें मजदूर, गरीब, आदिवासी, ग्रामीण और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन वर्गों में डर का माहौल है कि अगर वे आवश्यक दस्तावेज़ नहीं दे पाए तो उनका नाम सूची से हटा दिया जाएगा।
इन तमाम विवादों और चुनौतियों के बीच चुनाव आयोग का दावा है कि बिहार की जनता इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग ले रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि अब तक 57% फॉर्म वितरित किए जा चुके हैं और प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है। उन्होंने कहा, “हमें जनता से बड़ी मात्रा में प्रतिक्रिया मिल रही है। लोगों में जागरूकता है और वे मतदाता सूची को सही करने में सहयोग कर रहे हैं। हमारे पास अभी भी 16 दिन का समय है और हम इस कार्य को तय समय में पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोहराया कि चुनाव आयोग का उद्देश्य किसी को मतदान के अधिकार से वंचित करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में केवल पात्र नागरिकों के नाम शामिल हों। उन्होंने कहा, “हमारा काम लोकतंत्र को पारदर्शी बनाना है। यह तभी संभव होगा जब मतदाता सूची साफ़-सुथरी और त्रुटिरहित हो। आयोग हमेशा मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है।”
हालांकि, आयोग ने विपक्षी दलों द्वारा लगाए गए राजनीतिक पूर्वाग्रह के आरोपों पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं दी है। तृणमूल कांग्रेस, राजद और अन्य दलों ने आरोप लगाया है कि यह प्रक्रिया एक खास वर्ग या समुदाय को मताधिकार से वंचित करने की साजिश हो सकती है। इन दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर इस प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है। लेकिन आयोग केवल तकनीकी और प्रक्रिया के पहलुओं पर जोर दे रहा है।
बिहार में चल रही यह प्रक्रिया एक तरफ लोकतंत्र की शुद्धता के नाम पर पारदर्शिता लाने की पहल है, तो दूसरी ओर इससे नागरिक अधिकारों पर संकट की आशंका भी पैदा हो रही है। जहां चुनाव आयोग इसे लोकतांत्रिक मजबूती की दिशा में अहम कदम बता रहा है, वहीं समाज का एक बड़ा वर्ग इसे अधिकारों के हनन के रूप में देख रहा है। सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला तय करेगा कि “विशेष गहन पुनरीक्षण” की प्रक्रिया लोकतंत्र को और मजबूत बनाएगी या इसे विवादों में घेर देगी।
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