Elephant Attack: झारखंड के पश्चिम सिंहभूम के गांवों में आजकल सूरज ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है। रात के अंधेरे में किसी कुत्ते का भौंकना भी ग्रामीणों के दिल में सिहरन पैदा कर देता है। यह डर किसी अपराधी या डकैत का नहीं, बल्कि एक ऐसे जंगली हाथी का है जो ‘मौत का सौदागर’ बन चुका है। 1 जनवरी 2026 से शुरू हुए इस खूनी संघर्ष में अब तक 20 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। चाइबासा और कोल्हान के इलाकों में इस हाथी का खौफ इतना है कि कई परिवार घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर पलायन कर चुके हैं।
क्यों इतना आक्रामक और ‘कातिल’ हो गया है यह हाथी?
वन्यजीव विशेषज्ञों और वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस हाथी के हिंसक होने के पीछे दो मुख्य कारण हैं। पहला यह कि यह हाथी अपने झुंड से बिछड़ गया है, जिससे वह अत्यधिक तनाव में है। दूसरा और अधिक गंभीर कारण यह है कि हाथी वर्तमान में ‘मस्त’ (Heat) अवस्था में है। इस दौरान हाथियों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर सामान्य से कई गुना बढ़ जाता है, जिससे वे बेहद उत्तेजित और आक्रामक हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे सामान्य स्थिति में आने में अभी 15 से 20 दिन का समय और लग सकता है।
तीन राज्यों की पुलिस और 100 वनकर्मी मिशन पर तैनात
इस हत्यारे हाथी को काबू करने के लिए झारखंड के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों की टीमें भी जुटी हुई हैं। कुल 3 राज्यों के 100 से ज्यादा वनकर्मी और अधिकारी अत्याधुनिक उपकरणों के साथ घने जंगलों की खाक छान रहे हैं। हाथी को कई बार ट्रैंक्युलाइज (बेहोश) करने की कोशिश की गई, लेकिन वह हर बार चकमा देकर भागने में सफल रहा। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हाथी केवल रात के अंधेरे में हमला करता है और दिन में घने जंगलों में ओझल हो जाता है, जिससे उसकी सटीक लोकेशन का पता लगाना मुश्किल है।
लोकेशन बदलना और प्रतिदिन 30 किलोमीटर का सफर
यह जंगली हाथी केवल पश्चिम सिंहभूम तक सीमित नहीं है। वह लगातार अपनी जगह बदल रहा है और प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय कर रहा है। तेज रफ्तार से सफर करने के कारण वन विभाग को ऑपरेशन की रणनीति बनाने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों को सतर्क करने के लिए सरपंचों के माध्यम से सूचना तंत्र मजबूत किया गया है, ताकि हाथी के मूवमेंट की जानकारी तुरंत साझा की जा सके।
पेड़ों पर मचान और पटाखों का सहारा ले रहे ग्रामीण
दहशत का आलम यह है कि ग्रामीणों ने जंगल जाना पूरी तरह बंद कर दिया है। बच्चों को घरों के भीतर कैद कर दिया गया है। अपनी सुरक्षा के लिए लोगों ने पेड़ों पर ऊंचे मचान बनाए हैं। रात में पहरा देने के लिए ग्रामीण मशालों, लाठियों और पटाखों का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि हाथी को आबादी वाले क्षेत्र में आने से रोका जा सके। कई घरों के बाहर आग जलाकर रखी जा रही है ताकि हाथी को डराया जा सके।
इंसान और हाथियों के बीच बढ़ता खूनी संघर्ष
झारखंड में हाथियों और इंसानों के बीच का यह संघर्ष पुराना है। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 18 वर्षों में राज्य में हाथियों के हमले से 1270 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि इस दौरान 150 हाथियों की भी जान गई है। जंगलों के कटान और हाथियों के सुरक्षित ‘कॉरिडोर’ के 10 प्रतिशत हिस्से के खत्म होने से हाथी अब भोजन की तलाश में बस्तियों का रुख कर रहे हैं। झारखंड के करीब 600 हाथियों के लिए रहने की जगह कम पड़ रही है, जो इस टकराव की मुख्य जड़ है।
क्या अंतिम विकल्प के रूप में मारी जाएगी गोली?
हैदराबाद के प्रसिद्ध शिकारी नवाब शफत अली खान ने हाथी को पकड़ने के लिए अपनी सेवाएं देने की पेशकश की है। फिलहाल वन विभाग के पास तीन रास्ते हैं: पहला, हाथी को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करना (जो वर्तमान स्थिति में असंभव है); दूसरा, उसे बेहोश कर पकड़ना (जो अब तक विफल रहा है); और तीसरा अंतिम विकल्प, उसे ‘आदमखोर’ घोषित कर गोली मार देना। अब सबकी नजरें वन विभाग के अगले कदम पर टिकी हैं।
















