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End of Leftism in India : बंगाल, त्रिपुरा के बाद अब केरल… जहां से लेफ्ट गई वहां नहीं लौटी; अंत?

End of Leftism in India : केरल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक युग का अंत कर दिया है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की करारी शिकस्त के साथ ही न सिर्फ प्रदेश से कम्युनिस्ट सरकार की विदाई हुई है, बल्कि पांच दशकों में पहली बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जब भारत के किसी भी राज्य में वामपंथियों की सरकार नहीं बची है। जिस केरल की धरती से वर्ष 1957 में ईएमएस नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में वामपंथ का ‘सूर्योदय’ हुआ था, आज उसी प्रदेश से भारतीय लाल राजनीति का ‘सूर्यास्त’ होता नजर आ रहा है। यह हार केवल एक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक विचार के सिकुड़ते भौगोलिक दायरे का संकेत है।

पश्चिम बंगाल का 34 वर्षीय शासन और पतन की कहानी

भारतीय वामपंथ का सबसे सुनहरा दौर पश्चिम बंगाल में रहा, जहाँ 1977 से लेकर 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) का शासन रहा। ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य जैसे दिग्गजों ने बंगाल को वामपंथ का अभेद्य दुर्ग बना दिया था। हालांकि, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने 2011 में वामपंथ को ऐसा उखाड़ा कि वे अब तक वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वर्तमान में बंगाल की राजनीति से वाम दल लगभग हाशिए पर चले गए हैं और वहां मुख्य मुकाबला अब तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सिमट गया है।

1977 के बाद पहली बार देश हुआ ‘वामपंथ मुक्त’

केरल में एलडीएफ की विदाई के साथ ही 1977 के बाद पहली बार ऐसा ऐतिहासिक मोड़ आया है जब देश के किसी भी मानचित्र पर लाल झंडे वाली सरकार नहीं है। इससे पहले 2011 में पश्चिम बंगाल और 2018 में त्रिपुरा की सत्ता से वामपंथियों की विदाई हुई थी। वर्ष 2016 से लगातार केरल पर शासन कर रहा एलडीएफ अंतिम उम्मीद था, लेकिन अब वहां भी जनता ने बदलाव पर मुहर लगा दी है। दशकों तक श्रमिकों और किसानों की आवाज बनने वाले इन दलों के लिए यह अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट है।

राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव: किंगमेकर से मामूली उपस्थिति तक

एक समय था जब राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथियों की तूती बोलती थी। 1990 और 2000 के दशक में वाम दल लोकसभा में 40 से 50 सदस्यों के साथ गठबंधन सरकारों के भविष्य का फैसला करते थे। इनका प्रभाव 2004 में अपने चरम पर था, जब इन्होंने 61 सीटें जीतकर कांग्रेस की यूपीए-1 सरकार को बाहर से समर्थन दिया और मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर अपनी छाप छोड़ी। 1996 में तो ऐसी स्थिति बनी थी कि ज्योति बसु को प्रधानमंत्री पद की पेशकश की गई थी, जिसे पार्टी के भीतर मतभेदों के कारण ‘ऐतिहासिक भूल’ के रूप में ठुकरा दिया गया था।

सत्ता गंवाने के बाद वापसी की चुनौती और वर्तमान स्थिति

वामपंथ की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि उसने जहाँ भी सत्ता गंवाई, वहां दोबारा पैर नहीं जमा सका। आर्थिक उदारीकरण, श्रम कानूनों में बदलाव और पहचान आधारित राजनीति के उदय ने उनके पारंपरिक वोट बैंक को कमजोर कर दिया है। संगठनात्मक सुस्ती और कैडर की निराशा ने इस गिरावट को और तेज किया है। हालांकि, भारतीय राजनीति से वामपंथ पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है; वर्तमान में लोकसभा में माकपा के पांच और भाकपा (माले) लिबरेशन के दो सांसद हैं। कई राज्यों में उनके विधायक भी मौजूद हैं, लेकिन सत्ता का केंद्र अब उनसे कोसों दूर जा चुका है।

केरल की हार वामपंथी दलों के लिए आत्ममंथन का बड़ा अवसर है। चुनावी विमर्श के बदलते स्वरूप और युवा मतदाताओं की नई आकांक्षाओं के बीच वामपंथ को अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। क्या केरल में फिर कभी लाल झंडा लहराएगा या यह पतन स्थाई है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

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