Ganesh vehicle history : हिंदू धर्म में गणेश जी को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। हर शुभ कार्य से पहले उनकी पूजा का विधान है। उनका एक परिचित और प्रिय स्वरूप है—बड़े कान, लंबी सूंड, और उनके साथ बैठा एक छोटा सा चूहा यानी मूषक। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणेश जी की सवारी सिर्फ चूहा नहीं, बल्कि सतयुग से लेकर कलियुग तक उनके अलग-अलग वाहन रहे हैं?
गणेश चतुर्थी का पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है और इस दौरान भक्त गणेश जी की मूर्ति अपने घरों में स्थापित करते हैं। हर मूर्ति के साथ मूषक की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है, जो उनके मुख्य वाहन के रूप में पूज्य है। लेकिन धर्मग्रंथों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, गणेश जी ने हर युग में अलग-अलग सवारी की है, जिनका गहरा आध्यात्मिक और सांकेतिक महत्व है।
इस युग में गणेश जी का वाहन सिंह (शेर) था। उनका स्वरूप दस भुजाओं वाला और नाम विनायक था। सिंह साहस और शक्ति का प्रतीक है, जो विनायक के स्वरूप को दर्शाता है।
इस युग में भगवान गणेश की सवारी मयूर (मोर) थी। उन्हें मयूरेश्वर कहा गया। उनका रंग श्वेत और छह भुजाएं थीं। मोर सौंदर्य और शांति का प्रतीक माना जाता है।
द्वापर में गणेश जी की सवारी मूषक (चूहा) बनी, जो आज भी उनके साथ प्रमुख रूप से दिखाई देता है। वे चार भुजाओं के साथ गजानन कहलाए और उनका वर्ण लाल था। चूहा चंचलता, बुद्धिमत्ता और पैनी दृष्टि का प्रतीक माना जाता है।
वर्तमान युग यानी कलियुग में गणेश जी का वाहन घोड़ा बताया गया है। इस युग में उनका नाम धूम्रकेतु है। उनके दो भुजाएं हैं और रंग धूम्रवर्ण (धुएं जैसा)। घोड़ा ऊर्जा, गति और युद्ध की तैयारी का संकेत देता है।
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, क्रौंच नामक एक अभिमानी गंधर्व ने ऋषि वामदेव का अपमान किया। क्रोधित होकर ऋषि ने उसे चूहा बनने का श्राप दे दिया। वह विशाल चूहा बनकर ऋषियों के आश्रमों में उत्पात मचाने लगा। परेशान होकर ऋषियों ने भगवान गणेश की स्तुति की। गणेश जी ने उसे अपने पाश से बांध लिया। जब क्रौंच ने क्षमा मांगी, तब गणेश जी ने उसे अपनी सवारी के रूप में स्वीकार कर लिया। यह प्रतीक है कि अहंकार को वश में करके उपयोगी बनाया जा सकता है।
गणेश जी के वाहनों की विविधता उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाती है। सिंह से लेकर मूषक तक, हर वाहन किसी विशेष गुण या सिद्धांत का प्रतीक है। गणेश जी केवल विघ्नहर्ता नहीं, बल्कि हर युग के अनुरूप एक प्रेरणा देने वाले देवता हैं। गणेश चतुर्थी के मौके पर उनके इन रूपों को जानना हमारी श्रद्धा को और भी गहरा करता है।
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