Garuda Purana
Garuda Purana : सनातन धर्म में यह अकाट्य सत्य माना गया है कि जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया है, उसकी मृत्यु पूरी तरह निश्चित है। जन्म और मरण के इस बीच के कालखंड में मनुष्य जिस प्रकार के अच्छे या बुरे कर्म करता है, उसी के अनुरूप उसे भविष्य में फल भुगतने पड़ते हैं। जब किसी इंसान की मृत्यु होती है और वह यमलोक की कठिन यात्रा पर निकलता है, तो उसके साथ क्या घटित होता है, इसका बेहद विस्तृत और प्रामाणिक वर्णन ‘गरुड़ पुराण’ () में मिलता है।
वास्तव में गरुड़ पुराण सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु और उनके दिव्य वाहन पक्षीराज गरुड़ के बीच का एक अत्यंत पावन संवाद है। इसमें गरुड़ जी बड़ी उत्सुकता से भगवान से पूछते हैं कि देहत्याग के बाद जीवात्मा को यमलोक के मार्ग में किस-किस तरह के कष्ट या भोग भोगने पड़ते हैं?
पक्षीराज गरुड़ के इस गूढ़ प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान विष्णु कहते हैं कि मृत्यु के बाद जब आत्मा यमलोक की यात्रा पर आगे बढ़ती है, तो उसे कई तरह के पड़ावों से गुजरना पड़ता है। यमपुरी के मुख्य प्रवेश द्वार की रखवाली ‘श्याम’ और ‘शबल’ नाम के दो अत्यंत खूंखार और भयानक कुत्ते करते हैं। ये रक्षक केवल उन्हीं आत्माओं को अपनी गर्जना से डराते और प्रताड़ित करते हैं जिन्होंने जीवनभर केवल पाप कर्म किए होते हैं। इसके विपरीत, जो मनुष्य अपने जीवन में हमेशा धर्म, दया, परोपकार और सत्य के मार्ग पर चले हैं, उनकी आत्माएं बिना किसी भय के बेहद शांतिपूर्वक यमलोक में प्रवेश करती हैं। यमराज के दरबार में न्याय का पैमाना केवल मनुष्य के कर्म होते हैं, वहां व्यक्ति का सांसारिक पद, सामाजिक स्थिति, धन-दौलत या ओहदा कोई मायने नहीं रखता।
भगवान विष्णु समझाते हैं कि व्यक्ति के संचित कर्मों के आधार पर ही आत्मा का अगला ठिकाना तय होता है। अपने पाप-पुण्य के अनुसार आत्मा पशु, पक्षी, कीट, वृक्ष या अन्य सजीव प्राणियों सहित कुल 84 लाख योनियों के चक्र में जन्म लेती है। इन सभी योनियों में मनुष्य का जन्म मिलना अत्यंत दुर्लभ और सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जो केवल कई जन्मों के संचित पुण्यों के फलस्वरूप ही प्राप्त होता है। एक सुंदर दृष्टांत के माध्यम से भगवान कहते हैं कि “महाऋषि वशिष्ठ ने अपने शिष्यों को ज्ञान दिया था कि यह भौतिक शरीर महज एक वस्त्र के समान है।
जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को बदलता है, ठीक उसी तरह आत्मा इस शरीर रूपी वस्त्र को धारण करती है और समय पूरा होने पर इसे त्याग देती है।” इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति केवल ईश्वर की सच्ची भक्ति, आत्मज्ञान और सत्कर्मों से ही संभव है। मृत्यु के अंतिम क्षणों में मुख से ‘ओम्’ का जाप, कंठ में पवित्र गंगाजल और तुलसी के पत्ते का होना दिवंगत आत्मा को परम शांति देता है और उसे दिव्य मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
गरुड़ पुराण के नीति खंड में पुरुषों और महिलाओं के लिए उनके पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों के आधार पर मिलने वाले फलों का स्पष्ट वर्गीकरण किया गया है। इसमें कहा गया है कि जो स्त्री धर्म की मर्यादाओं को समझते हुए, निस्वार्थ भाव से अपने परिवार और बच्चों की सेवा करती है, वह मृत्यु के पश्चात सीधे स्वर्गलोक की अधिकारी बनती है।
वहीं, जो पुरुष अपनी अर्धांगिनी (पत्नी), माता-पिता और बच्चों का सदैव आदर-सम्मान करता है और उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है, उसे पितृलोक में उच्च स्थान प्राप्त होता है। इसके बिल्कुल विपरीत, जो व्यक्ति अपने ही परिवार में ईर्ष्या, कलह, द्वेष और अशांति फैलाता है, उसे मृत्यु के बाद घोर अंधकारमय नरक में डाल दिया जाता है, जहां उसे लंबे समय तक असहनीय यातनाएं और कष्ट भोगने पड़ते हैं।
शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य की मृत्यु के ठीक बाद दस दिनों तक किया जाने वाला ‘पिंडदान’ का धार्मिक अनुष्ठान बेहद महत्वपूर्ण और अनिवार्य माना गया है। इस अनुष्ठान के माध्यम से ही भटकती हुई निराकार आत्मा को एक ‘सूक्ष्म शरीर’ प्राप्त होता है। इसी सूक्ष्म शरीर के सहारे वह यमलोक की अत्यंत कठिन और लंबी यात्रा को तय करने में सक्षम हो पाती है। यदि मृतक के परिवार वाले उसका श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण विधि-विधान से संपन्न नहीं करते हैं, तो वह बेचैन आत्मा प्रेतलोक में ही फंसी रह जाती है। इस दौरान उस जीवात्मा को भयंकर मानसिक और शारीरिक पीड़ा भोगनी पड़ती है, इसलिए शास्त्रों में मृत पूर्वजों के निमित्त तर्पण करना सबसे आवश्यक कर्तव्य बताया गया है।
संसार के कल्याण के लिए भगवान विष्णु पक्षीराज गरुड़ से कहते हैं कि जो कोई भी मनुष्य अत्यंत श्रद्धा और शुद्ध अंतःकरण के साथ इस गरुड़ पुराण का श्रवण करता है या इसका स्वयं अध्ययन करता है, उसके जन्म-जन्मांतर के सभी घोर पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। ऐसा पुण्यात्मा जीव अंततः सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के परम पवित्र और दिव्य धाम ‘वैकुंठ’ को प्राप्त करता है। गरुड़ पुराण में निहित यह गूढ़ रहस्यमयी ज्ञान संसार के लोगों को केवल डराने या भयभीत करने के लिए नहीं रचा गया है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य भटके हुए मानव समाज को अधर्म के दलदल से निकालकर धर्म, नैतिकता और सत्य के प्रकाशमय मार्ग पर लाना है।
सांसारिक देह के पंचतत्व में विलीन होने के बाद भी आत्मा की चेतना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। वह जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है, उसे भी इंसानों की तरह ही तीव्र भूख और प्यास का तीव्र अनुभव होता है। यमराज के दूत (यमदूत) उस सूक्ष्म आत्मा को उसके द्वारा जीवनभर किए गए कर्मों की गति के अनुसार जबरन आगे खींचकर ले जाते हैं।
इस सफर के दौरान मृत आत्मा को उस समय सबसे बड़ा संबल मिलता है, जब उसके पीछे उसके परिवार वाले और सगे-संबंधी धरती पर उसके नाम से दान-पुण्य और सत्कार्य करते हैं। परिजनों द्वारा किए गए इन पवित्र दान और सद्गुणों का सीधा फल उस यात्रा कर रही आत्मा को प्राप्त होता है, जिससे उसकी यमलोक की डरावनी राह बेहद आसान और सुगम हो जाती है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में किसी की मृत्यु के बाद असहायों को अन्न, जल और वस्त्र दान करने की महिमा को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है।
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