Global oil crisis 2026
Global oil crisis 2026 : स्ट्रैट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) में जारी नाकेबंदी के कारण पूरी दुनिया में कच्चे तेल का संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है, लेकिन फिलहाल इसका कोई स्थाई समाधान नजर नहीं आ रहा है। संकट की शुरुआत में अमेरिका ने वैश्विक बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए रूस समेत कुछ प्रमुख देशों पर लगे तेल निर्यात प्रतिबंधों में ढील दी थी। इस अस्थायी राहत का फायदा उठाकर भारत लगातार रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदता रहा, जिससे देश के भीतर ईंधन की कोई किल्लत नहीं हुई। इस रणनीति की बदौलत भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल झटके के प्रभाव से सुरक्षित बच निकला था। हालांकि, अब भारत के लिए यह सुरक्षा कवच और रियायती विंडो बंद होती नजर आ रही है, क्योंकि अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीद पर दी गई विशेष छूट को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है।
कागज पर देखने में तो ट्रंप प्रशासन का यह फैसला सिर्फ एक नीतिगत बदलाव लगता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह भारत के एनर्जी सेक्टर के लिए एक बहुत बड़ा रणनीतिक झटका है। वर्तमान में होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही काफी धीमी हो चुकी है और समुद्री माल ढुलाई के साथ-साथ इंश्योरेंस (बीमा) का खर्च भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया है। इस भू-राजनीतिक तनाव और लड़ाई की शुरुआत होने से पहले वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब $72 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई थी। अमेरिकी पाबंदियों और सुरक्षा संकट के चलते अब यही कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में उछलकर $105 प्रति बैरल के भी पार चला गया है, जिसने भारतीय आयातकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
अमेरिकी फैसले के बाद अब भारत के सामने एक साथ दोहरी मुसीबत खड़ी हो गई है। एक तरफ जहां मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) से तेल का प्रवाह लगातार अस्थिर बना हुआ है, वहीं दूसरी तरफ रूसी तेल पर दोबारा कड़े प्रतिबंधों का खतरा मंडराने लगा है। यह संकट ऐसे समय में आया है जब भारतीय तेल कंपनियों ने हाल ही में घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतों में लगभग 3 रुपये की बढ़ोतरी की है। ऐसे में अब यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या आम उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतें और ज्यादा बढ़ेंगी। इन विपरीत परिस्थितियों के बीच अब भारत के पास इस आर्थिक और रणनीतिक संकट से निपटने के लिए बेहद सीमित विकल्प बचे हैं।
यूक्रेन और रूस के बीच युद्ध छिड़ने के बाद जब अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूसी तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, तब भारत और चीन ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस से तेल की खरीद जारी रखी थी। इसके बदले में रूस ने दोनों देशों को भारी डिस्काउंट (छूट) पर क्रूड ऑयल ऑफर किया था। पिछले करीब दो साल तक यह रियायती तेल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई से बचाने वाला सबसे बड़ा सुरक्षा कवच साबित हुआ। भारत ने रिकॉर्ड मात्रा में रशियन क्रूड खरीदा, जिससे घरेलू रिफाइनर कंपनियों ने भी बेहतरीन मार्जिन कमाया। समय के साथ रूस परंपरागत सप्लायर्स को पछाड़कर भारत का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल सप्लायर बन गया।
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव के बाद जैसे ही फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास युद्ध का तनाव बढ़ा, कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई। बाजार में यह डर फैल गया कि सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे बड़े उत्पादकों से होने वाली तेल की सप्लाई पूरी तरह ठप हो सकती है। इस बड़े संकट को टालने के लिए अमेरिका ने अस्थायी रूप से नियमों में ढील देते हुए भारत जैसे देशों को बिना किसी तुरंत पेनल्टी के पहले से लोड किए गए रूसी क्रूड कार्गो को खरीदने की इजाजत दी थी।
भारत ने इस छूट की अवधि को आगे बढ़ाने के लिए वाशिंगटन पर काफी कूटनीतिक जोर भी डाला। शुरुआत में अमेरिकी प्रशासन वैश्विक ऊर्जा स्थिरता का तर्क देकर मान गया, लेकिन धीरे-धीरे अमेरिकी सांसदों और यूरोपीय देशों का राजनीतिक दबाव बढ़ने लगा, जिनका आरोप था कि इस छूट से मॉस्को को यूक्रेन युद्ध के बीच भारी वित्तीय फायदा मिल रहा है। नतीजतन, रविवार को यह छूट आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई।
इस छूट के खत्म होते ही भारतीय रिफाइनरियों के लिए रिस्क कैलकुलेशन पूरी तरह बदल गया है। भारत की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह अपनी कुल जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में होने वाली कोई भी बढ़ोतरी सीधे तौर पर देश की रिटेल महंगाई, सरकारी खजाने, चालू खाता घाटे और आर्थिक विकास दर पर नकारात्मक असर डालती है। केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, मई महीने में भारत का रूसी तेल आयात रिकॉर्ड 2.3 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया था और कुल आयात में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग आधी थी।
यदि प्रतिबंधों के डर से रिफाइनरी कंपनियां रूस से खरीदारी कम करती हैं, तो उन्हें मजबूरन मिडिल ईस्ट के अस्थिर बाजार का रुख करना होगा, जिससे देश का तेल आयात बिल आसमान छूने लगेगा। इसका सीधा दबाव आम उपभोक्ताओं पर पेट्रोल, डीजल, एलपीजी सिलेंडर, हवाई किराए और लॉजिस्टिक्स खर्च में भारी बढ़ोतरी के रूप में सामने आएगा। सरकार अब टैक्स कटौती या तेल कंपनियों को नुकसान उठाने का निर्देश देकर इस दबाव को कम करने का प्रयास कर सकती है, लेकिन इसके लिए देश को एक बड़ी वित्तीय कीमत चुकानी होगी।
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