US Iran Strikes 2026: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में पिछले एक सप्ताह से जारी इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच का भीषण संघर्ष अब कूटनीतिक दरारें पैदा करने लगा है। ताजा खबरों के अनुसार, ईरान पर की गई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने कई खाड़ी देशों को नाराज कर दिया है। इन देशों का स्पष्ट आरोप है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने से पहले अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को विश्वास में नहीं लिया। खाड़ी देशों का तर्क है कि बिना किसी पूर्व सूचना के किए गए इन हमलों ने उन्हें ईरान के संभावित और घातक जवाबी हमलों के सामने असुरक्षित छोड़ दिया है, जिससे पूरे क्षेत्र की स्थिरता खतरे में पड़ गई है।
सूचना का अभाव और सुरक्षा की अधूरी तैयारी का संकट
अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए संयुक्त हवाई हमलों के जवाब में ईरान ने कई खाड़ी देशों को निशाना बनाते हुए ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं। दो खाड़ी देशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनकी सरकारें वाशिंगटन के रवैये से बेहद निराश हैं। अधिकारियों का कहना है कि पिछले शनिवार को ईरान पर किए गए शुरुआती हमले के तरीके और समय की जानकारी उन्हें नहीं दी गई थी। यदि उन्हें समय रहते सूचित किया गया होता, तो वे अपनी हवाई सुरक्षा प्रणाली को सक्रिय कर सकते थे और नागरिकों की सुरक्षा के लिए बेहतर इंतजाम कर सकते थे। इस कूटनीतिक चूक ने सहयोगियों के बीच भरोसे की कमी को उजागर कर दिया है।
चेतावनी की अनदेखी: क्षेत्र पर मंडराते गंभीर परिणाम
अधिकारियों के मुताबिक, उन्होंने सैन्य कार्रवाई शुरू होने से पहले ही अमेरिका को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि ईरान पर सीधा हमला पूरे क्षेत्र के लिए ‘पेंडोरा बॉक्स’ खोलने जैसा होगा। उन्होंने अंदेशा जताया था कि इस युद्ध के परिणाम अत्यंत विनाशकारी हो सकते हैं, लेकिन उनके दावों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने इन चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया। अब जब ईरान ने अपनी पूरी ताकत के साथ जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी है, तो खाड़ी देशों को उस युद्ध की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है जिसे उन्होंने शुरू भी नहीं किया था। यह स्थिति इन देशों के आर्थिक और सामरिक हितों को गहरी चोट पहुँचा रही है।
इजरायल केंद्रित नीति: इंटरसेप्टर मिसाइलों का घटता भंडार
खाड़ी देशों में अब यह भावना प्रबल होती जा रही है कि अमेरिका के इस पूरे सैन्य अभियान का मुख्य उद्देश्य केवल इजरायल और अमेरिकी सैनिकों की रक्षा करना था। एक अधिकारी ने कड़े शब्दों में कहा कि खाड़ी देशों को उनकी सुरक्षा के लिए उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। स्थिति इतनी नाजुक है कि इन देशों में ड्रोन और मिसाइलों को हवा में नष्ट करने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से खत्म हो रहा है। संसाधनों की इस कमी ने इन देशों के भीतर सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है, जबकि सऊदी अरब, कुवैत और बहरीन जैसे देशों ने इस संवेदनशील मुद्दे पर फिलहाल आधिकारिक चुप्पी साधी हुई है।
व्हाइट हाउस का बचाव: ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की सफलता का दावा
दूसरी ओर, व्हाइट हाउस ने इन आरोपों के बीच अपनी कार्रवाई का बचाव किया है। प्रवक्ता एना केली ने बयान जारी कर कहा कि ईरान की जवाबी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता में लगभग 90 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” को दिया, जिसके तहत ईरान के मिसाइल लॉन्च पैड्स और हथियार निर्माण इकाइयों को निशाना बनाया गया है। केली के अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप लगातार सहयोगी देशों के संपर्क में हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ईरान द्वारा किए जा रहे जवाबी हमले खुद इस बात का प्रमाण हैं कि इस वैश्विक खतरे को जड़ से खत्म करना क्षेत्र की दीर्घकालिक शांति के लिए कितना अनिवार्य है।
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