Hindu Kush Glacier Melting: नेपाल में अचानक आई भीषण बाढ़ के बाद हिमालयी ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई है। प्रारंभिक जानकारी में बाढ़ के पीछे ग्लेशियर के एक हिस्से के टूटने की बात सामने आई है। इसी बीच हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से जुड़ी एक रिपोर्ट ने भविष्य के खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में बर्फ तेजी से कम हो रही है।
ICIMOD की रिपोर्ट में सामने आया बड़ा बदलाव
अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट यानी ICIMOD की 21 मार्च 2026 की रिपोर्ट में हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र के ग्लेशियरों की स्थिति का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2000 के बाद इस क्षेत्र के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार लगभग दोगुनी हो गई है। वैज्ञानिकों के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंदू कुश हिमालय एशिया की जल सुरक्षा में बेहद अहम भूमिका निभाता है।
1975 से ग्लेशियरों की बर्फ में बड़ी कमी
रिपोर्ट के अनुसार, 1975 से अब तक क्षेत्र के ग्लेशियरों की बर्फ की मोटाई में कुछ स्थानों पर 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं। इन्हें ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया के महत्वपूर्ण बर्फ भंडारों में गिना जाता है। इन ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी एशिया की कई प्रमुख नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
करोड़ों लोगों की जिंदगी ग्लेशियरों पर निर्भर
हिंदू कुश हिमालय से निकलने वाली नदियां एशिया के बड़े हिस्से की जल जरूरत पूरी करती हैं। करीब 200 करोड़ लोगों की पानी, भोजन और आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन नदी प्रणालियों से जुड़ी हुई है। ऐसे में ग्लेशियरों के लगातार सिकुड़ने का असर केवल पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में कृषि, पेयजल और ऊर्जा सुरक्षा पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
1990 से 2020 के बीच भी आई बड़ी गिरावट
रिपोर्ट में बताया गया है कि 1990 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में लगभग 12 प्रतिशत की कमी आई। इसी अवधि में ग्लेशियरों के कुल बर्फ भंडार में करीब 9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि क्षेत्र में बर्फ के नुकसान की प्रक्रिया लंबे समय से जारी है और इसकी गति भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकती है।
छोटे ग्लेशियर सबसे ज्यादा खतरे में
वैज्ञानिकों के अनुसार, 0.5 वर्ग किलोमीटर से छोटे ग्लेशियर अपेक्षाकृत तेजी से गायब हो रहे हैं। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के करीब 75 प्रतिशत ग्लेशियर इसी छोटी श्रेणी में आते हैं। इनके तेजी से पिघलने से पहाड़ी क्षेत्रों में भविष्य में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसके साथ ही ग्लेशियरों से बनी झीलों के अचानक फटने यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा भी बढ़ सकता है।
नेपाल में ग्लेशियर टूटने की घटना ने बढ़ाई चिंता
नेपाल में हालिया बाढ़ के दौरान ग्लेशियर के हिस्से के टूटने की जानकारी सामने आने के बाद GLOF और हिमालयी आपदाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जिस ग्लेशियर क्षेत्र को इस घटना से जोड़ा जा रहा है, उसका आकार करीब 0.2 वर्ग किलोमीटर बताया गया है। हालांकि, किसी विशेष घटना के सटीक कारण और स्वरूप की पुष्टि विस्तृत वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक जांच के बाद ही की जा सकती है।
ग्लेशियरों की निगरानी को लेकर बड़ी कमी
इतने बड़े हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की निगरानी व्यवस्था अभी भी सीमित बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक पूरे क्षेत्र में केवल 38 ग्लेशियरों की नियमित निगरानी की जा रही है। इनमें से सिर्फ सात ग्लेशियर ऐसे हैं, जिनकी निगरानी वैश्विक मानकों के अनुरूप मानी जाती है। इससे क्षेत्र में हो रहे तेज बदलावों को समय रहते समझने और संभावित आपदाओं की चेतावनी देने में चुनौती बनी हुई है।
कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पर्याप्त डेटा नहीं
विशेषज्ञों के मुताबिक कराकोरम, सिक्किम, जांस्कर और भूटान समेत कई महत्वपूर्ण हिमालयी हिस्सों में ग्लेशियरों से जुड़ा पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है। लगातार बदलते तापमान और बर्फ पिघलने की परिस्थितियों के बीच नियमित निगरानी बेहद जरूरी हो जाती है। बेहतर डेटा मिलने से वैज्ञानिक ग्लेशियरों के व्यवहार, जल उपलब्धता और संभावित बाढ़ जैसे खतरों का अधिक सटीक आकलन कर सकेंगे।
जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए तैयारी जरूरी
हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना आने वाले वर्षों में जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियरों की वैज्ञानिक निगरानी बढ़ाने, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समय रहते चेतावनी प्रणाली मजबूत करने की जरूरत है। नेपाल की बाढ़ जैसी घटनाएं इस बात की ओर ध्यान दिलाती हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में बदलती जलवायु परिस्थितियों के प्रभाव से निपटने के लिए तैयारी पहले से मजबूत करनी होगी।
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