Supreme Court remark: ‘आप भक्त हैं तो भगवान विष्णु से जाकर कहिए…’ – सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से उठे सवाल, जानिए पूरा मामला

Supreme Court remark: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक अनोखी याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें खंडित भगवान विष्णु की प्रतिमा की मरम्मत को लेकर एक भक्त द्वारा अदालत से गुहार लगाई गई थी। याचिकाकर्ता राकेश दलाल ने कहा कि मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की 7 फुट ऊंची प्रतिमा खंडित अवस्था में है और इस कारण भक्त पूजा नहीं कर पा रहे हैं।

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इस याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अनुपस्थिति में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया और सुनवाई से इंकार कर दिया।

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याचिकाकर्ता की दलील: सरकार और विभाग से की गई सभी अपीलें नाकाम

राकेश दलाल ने कोर्ट को बताया कि वह भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं। उन्होंने कहा कि मुगल आक्रमण के दौरान प्रतिमा खंडित की गई थी और आजादी के 77 साल बाद भी सरकार ने उसकी मरम्मत नहीं कराई। दलाल ने बताया कि इस विषय में सरकारी विभागों को ज्ञापन दिए गए, प्रदर्शन हुए, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। अंत में उन्होंने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अदालत से अपील की कि यह सिर्फ मूर्ति का मामला नहीं है, बल्कि आस्था और पूजा के अधिकार का प्रश्न है।

कोर्ट की प्रतिक्रिया: “भगवान विष्णु से ही प्रार्थना कीजिए”

सुनवाई के दौरान CJI गवई ने हल्के-फुल्के लेकिन गंभीर लहजे में कहा “आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं, तो फिर उन्हीं से प्रार्थना कीजिए। हम इस मामले में कुछ नहीं कर सकते। यह विषय अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्गत आता है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला न्यायपालिका की सीधी हस्तक्षेप की सीमा से बाहर है, और इसे संबंधित सरकारी एजेंसियों जैसे कि ASI के पास ले जाना ही उचित होगा।

क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ?

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि ऐतिहासिक स्मारकों या मंदिरों में मूर्तियों की स्थिति और उनकी मरम्मत का दायित्व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का होता है, न कि न्यायपालिका का। यदि कोई धार्मिक भावना आहत होती है, तो प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत समाधान तलाशा जाना चाहिए।

आस्था बनाम अधिकार क्षेत्र

यह मामला दिखाता है कि किस प्रकार धार्मिक आस्था और कानूनी दायरे के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। जहां एक ओर भक्त की भावना और धार्मिक अधिकार को अनदेखा नहीं किया जा सकता, वहीं न्यायपालिका को भी अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाएं ध्यान में रखनी होती हैं।

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