Bangladesh Political: बांग्लादेश की राजधानी ढाका से एक गंभीर और चिंताजनक खबर सामने आई है, जहां देश के स्वतंत्रता सेनानियों को आतंकवादी बताकर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। शुक्रवार को ढाका की एक अदालत ने आतंकवाद विरोधी अधिनियम के तहत 16 लोगों की हिरासत आदेश जारी किया, जिनमें कई वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी, प्रोफेसर और पत्रकार शामिल हैं। यह घटना बांग्लादेश के राजनीतिक और सामाजिक माहौल में एक बड़ी हलचल पैदा कर रही है।
गुरुवार को ढाका में स्वतंत्रता सेनानियों की एक सभा पर कट्टरपंथियों ने अचानक हमला कर दिया। इस हमले के बाद पुलिस ने ‘सुरक्षा’ के नाम पर उन 16 पीड़ितों को हिरासत में ले लिया। आश्चर्य की बात यह रही कि गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद दमन अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर दिया गया। पुलिस ने आरोप लगाया कि आरोपियों की पहचान और पते पूरी तरह से जांचे नहीं गए हैं, इसलिए उनकी हिरासत आवश्यक है।
आरोपपत्र में दावा किया गया है कि गिरफ्तार 16 लोगों में कम से कम छह स्वतंत्रता सेनानी हैं। इनमें पूर्व मंत्री और स्वतंत्रता सेनानी अब्दुल लतीफ़ सिद्दीकी, ढाका विश्वविद्यालय के विधि प्रोफेसर हाफ़िज़ुर रहमान कुर्जुन और पत्रकार मंज़ुरुल आलम पन्ना जैसे नाम शामिल हैं। यह गिरफ्तारी बांग्लादेश में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है।
यह घटना ‘मंच 71’ नामक संगठन द्वारा आयोजित एक परिचर्चा के दौरान हुई, जो ढाका रिपोर्टर्स यूनिटी ऑडिटोरियम में आयोजित की गई थी। जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ, ‘जुलाई सेनानी’ कहे जाने वाले हमलावरों ने सभागार में घुसकर कार्यक्रम को बाधित किया, बैनर फाड़े और कई लोगों को पीटा। हमलावरों ने आयोजकों को ‘शेख हसीना के फासीवादी शासन के सहयोगी’ कहकर आरोपित किया। आयोजनकर्ताओं ने कहा कि हमलावरों की जगह वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार करना स्पष्ट साजिश है, जिसका मकसद मुक्ति संग्राम के इतिहास को दबाना है।
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के महासचिव मिर्ज़ा फ़ख़रुल इस्लाम आलमगीर ने कहा है कि “लोगों को 1971 की आज़ादी की लड़ाई को भुलाने की कई कोशिशें हो रही हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि “हम 1971 को नहीं भूले हैं और इसे भूलने का समय नहीं है।” स्वतंत्रता सेनानी और वकील ज़ेडआई खान पन्ना ने इस हमले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया और हमलावरों को अपराधी करार दिया।
यह मामला बांग्लादेश में राजनीतिक तनाव, अभिव्यक्ति की आज़ादी, और इतिहास की पुनः व्याख्या के मुद्दे पर सवाल खड़ा करता है। स्वतंत्रता सेनानियों को आतंकवादी बताकर जेल भेजना केवल एक राजनीतिक षड़यंत्र नहीं, बल्कि इतिहास को मिटाने और लोगों को डराने-धमकाने की कोशिश भी माना जा रहा है।
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