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Lithium Mission 2026: माली के लिथियम प्रोजेक्ट से भारत का अचानक पीछे हटना, क्या है असली वजह?

Lithium Mission 2026: भारत ने अपनी वैश्विक ऊर्जा रणनीति में एक बड़ा और साहसिक बदलाव करते हुए पश्चिम अफ्रीकी देश माली में रूस समर्थित लिथियम परियोजना से हटने का निर्णय लिया है। यह फैसला केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं, बल्कि नई दिल्ली की बदलती विदेश नीति और सुरक्षा प्राथमिकताओं का परिचायक है। माली वर्तमान में गंभीर राजनीतिक अस्थिरता और अल-कायदा जैसे खूंखार आतंकी समूहों की हिंसा की चपेट में है। ऐसे में भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने निवेश और नागरिकों की सुरक्षा के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।

रूसी प्रस्ताव और भारतीय सार्वजनिक उपक्रमों की भूमिका

पिछले वर्ष रूस की प्रमुख परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम (Rosatom) ने भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों— खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KABIL) और एनएलसी इंडिया (NLC) से माली में लिथियम की खोज और खनन के लिए सहयोग की पेशकश की थी। रूस चाहता था कि भारतीय विशेषज्ञता और निवेश उसके प्रभाव वाले इस अफ्रीकी क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा बने। हालांकि, प्रारंभिक चर्चाओं के बाद भारत ने जमीनी हकीकत का आकलन किया और इस जोखिम भरे प्रस्ताव से दूरी बनाना ही बेहतर समझा।

सुरक्षा जोखिम: आतंकी हिंसा और अस्थिरता बनी बड़ी बाधा

रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, माली में विदेशी निवेश और संपत्तियों पर बढ़ते हमलों ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। वहां की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका जैसे विकसित देशों ने पहले ही अपने नागरिकों के लिए सख्त ‘ट्रैवल एडवाइजरी’ जारी कर उन्हें माली छोड़ने को कह दिया है। भारत ने महसूस किया कि रूसी सैन्य सहयोग के बावजूद माली में सुरक्षा की गारंटी देना मुश्किल है, और ऐसी स्थिति में करोड़ों डॉलर का निवेश करना एक ‘डेड-एंड’ साबित हो सकता है।

लिथियम का महत्व: भारत का ग्रीन एनर्जी और EV लक्ष्य

दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर अग्रसर भारत के लिए लिथियम ‘सफेद सोना’ (White Gold) के समान है। भारत ने 2030 तक अपनी सड़कों पर 30% इलेक्ट्रिक कारें और 80% दोपहिया वाहन उतारने का महात्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। नेट-जीरो उत्सर्जन की प्राप्ति और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए लिथियम बैटरी का उत्पादन अनिवार्य है। यही कारण है कि भारत लिथियम की सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने के लिए सक्रिय है, लेकिन वह इसके लिए ‘माली’ जैसे खतरनाक क्षेत्रों में कूदने के बजाय सुरक्षित विकल्पों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

वैकल्पिक रणनीति: अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया के साथ नए गठबंधन

माली से पीछे हटना भारत की ‘सतर्क कूटनीति’ का हिस्सा है। भारत अब रूस या किसी एक अस्थिर क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय अपनी बास्केट को विविध (Diversify) बना रहा है। साल 2024 में KABIL ने अर्जेंटीना के साथ पांच लिथियम ब्लॉकों के लिए एक बड़ा समझौता किया, जो इसी दीर्घकालिक और सुरक्षित रणनीति का प्रमाण है। इसके अलावा, ऑस्ट्रेलिया और चिली जैसे खनिज संपन्न और लोकतांत्रिक रूप से स्थिर देशों के साथ भारत की बातचीत अंतिम दौर में है।

कूटनीतिक संदेश: रूस के साथ संबंधों और आर्थिक हितों का संतुलन

यह घटनाक्रम भारत और रूस के संबंधों के एक नए पहलू को भी दर्शाता है। जहां एक ओर रूस सैन्य शक्ति के माध्यम से अफ्रीका में अपना आधार बढ़ा रहा है, वहीं भारत अपनी आर्थिक प्रगति को किसी भी युद्ध या आतंकी साये से दूर रखना चाहता है। अधिकारियों का मानना है कि महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए केवल दोस्ती नहीं, बल्कि ‘विश्वसनीयता’ और ‘स्थिरता’ सबसे बड़े मापदंड होने चाहिए। भारत का यह फैसला साबित करता है कि वह वैश्विक ऊर्जा मानचित्र पर अब एक स्वायत्त और सजग खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है।

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