India-Iran Deal
India-Iran Deal: मिडिल ईस्ट में युद्ध की विभीषिका थमने का नाम नहीं ले रही है। हाल ही में अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के रणनीतिक तेल निर्यात केंद्र, खर्ग द्वीप पर किए गए भीषण हमले ने पूरे क्षेत्र में तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है। इस हमले को अमेरिका की अब तक की सबसे विनाशकारी सैन्य कार्रवाई माना जा रहा है। खर्ग द्वीप के नष्ट होने से न केवल ईरान की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँची है, बल्कि चीन के आर्थिक हितों को भी बड़ा झटका लगा है, क्योंकि वह ईरानी तेल का मुख्य खरीदार है। इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों, विशेष रूप से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में असुरक्षा की स्थिति पैदा कर दी है, जिससे भारत जैसे ऊर्जा निर्भर देशों की चिंताएं बढ़ गई हैं।
क्षेत्रीय अस्थिरता के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ईरान के साथ एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समझ बनाई है। सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी के अनुसार, नई दिल्ली और तेहरान के बीच एक ‘क्विड प्रो क्वो’ (Quid Pro Quo) यानी ‘लेन-देन’ आधारित गुप्त समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फंसे भारत के दो महत्वपूर्ण तेल टैंकरों, ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ को सुरक्षित गुजरने की अनुमति प्रदान की। ये दोनों टैंकर 92,000 टन से अधिक एलपीजी लेकर सफलतापूर्वक भारत पहुँच चुके हैं। हालांकि, रिपोर्टों की मानें तो अभी भी भारत के लगभग 22 टैंकर इस खतरनाक जलमार्ग में फंसे हुए हैं, जिन्हें निकालने के लिए बातचीत जारी है।
इस समझौते के हिस्से के रूप में, भारत ने मानवीय और कूटनीतिक आधार पर ईरानी नौसेना के लगभग 180 नाविकों को उनके देश लौटने की अनुमति दी। ये नाविक ईरानी नौसैनिक जहाज ‘IRIS लवान’ के चालक दल के सदस्य थे। अमेरिकी हमलों और हिंद महासागर में बढ़ती हलचल के बीच यह जहाज सुरक्षा की तलाश में कोच्चि बंदरगाह पहुँचा था, जहाँ भारत ने इसे शरण दी थी। गुरुवार और शुक्रवार के बीच एक चार्टर्ड फ्लाइट के जरिए इन नाविकों को कोच्चि से तेहरान भेजा गया। भारत के इस कदम को ईरान के प्रति एक सद्भावना संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिसके बदले में भारतीय टैंकरों को रास्ता मिला।
यह पूरा घटनाक्रम 4 मार्च को हुई उस हिंसक झड़प से भी जुड़ा है, जब अमेरिकी पनडुब्बी ‘यूएसएस चार्लोटी’ ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरान के फ्रिगेट ‘आईआरआईएस डेना’ पर हमला कर उसे डुबो दिया था। यह घटना श्रीलंका के पास भारतीय समुद्री सीमा से बाहर हुई थी। इस भीषण हमले में 87 ईरानी नाविकों की मृत्यु हो गई थी, जबकि कई अब भी लापता हैं। इस घटना ने ईरान को रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया और इसी तनावपूर्ण माहौल में ‘IRIS लवान’ ने भारतीय तट पर आश्रय लिया था। भारत ने इस संवेदनशील स्थिति को अत्यंत कुशलता से संभालते हुए अपने आर्थिक हितों की रक्षा की है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए जीवनरेखा के समान है। भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से आयात करता है। इसके अतिरिक्त, कतर से आने वाली एलपीजी (LPG) की भारी खेप भी इसी रास्ते से गुजरती है। वर्तमान युद्ध की स्थिति में यदि यह मार्ग लंबे समय तक अवरुद्ध रहता है, तो भारत में ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो सकती है। ‘शिवालिक’ और ‘नंदा देवी’ का सुरक्षित निकलना भारत की सक्रिय कूटनीति की एक बड़ी जीत मानी जा रही है, जो युद्धरत देशों के बीच भी अपने हितों को साधने में सक्षम रही है।
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