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India Venezuela Relations: क्या भारत ने पुराने दोस्त वेनेज़ुएला से फेर लिया मुंह? इंदिरा की विरासत और मोदी की कूटनीति पर छिड़ी बहस

India Venezuela Relations: अक्टूबर 1968 का वह समय भारत-वेनेज़ुएला संबंधों के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दक्षिण अमेरिकी देशों के अपने दौरे के दौरान वेनेज़ुएला में कदम रखा था। यद्यपि वह प्रवास संक्षिप्त था, लेकिन उसने दोनों देशों के बीच अगले 50 वर्षों के लिए मित्रता की एक अडिग नींव रख दी थी। वेनेज़ुएला एशिया का वह पहला देश था जिसने नई दिल्ली में अपना दूतावास खोला था। काराकास के सिमोन बोलिवर एयरपोर्ट पर इंदिरा गांधी का स्वागत करने के लिए राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक मौजूद थे। उस यात्रा के दौरान इंदिरा गांधी ने कहा था, “मैं लैटिन अमेरिका और भारत के बीच प्यार का पुल बनाने आई हूँ।”

बांग्लादेश युद्ध और वैश्विक मंच पर वेनेज़ुएला का अटूट साथ

इंदिरा गांधी की उस यात्रा का असर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान स्पष्ट रूप से दिखा। जब पाकिस्तान और भारत दोनों ही अंतरराष्ट्रीय समर्थन के लिए लैटिन अमेरिका की ओर देख रहे थे, तब वेनेज़ुएला वह देश था जिसने क्यूबा के बाद भारत का सबसे मुखर समर्थन किया। वेनेज़ुएला की संसद ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समर्थन में बाकायदा एक प्रस्ताव पारित किया था। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र में दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति, नामीबिया के मुद्दे और निरस्त्रीकरण जैसे महत्वपूर्ण वैश्विक विषयों पर वेनेज़ुएला हमेशा नई दिल्ली के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा। 2005 में ह्यूगो शावेज़ और 2012 में निकोलस मादुरो की भारत यात्रा ने इन संबंधों को और प्रगाढ़ किया था।

मादुरो संकट और भारत का ‘नरम’ रुख: क्या हिल गई संबंधों की नींव?

वर्तमान परिस्थितियों में, जब अमेरिका ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए सैन्य हस्तक्षेप जैसी कार्रवाई की, तो पूरी दुनिया की नजरें भारत पर थीं। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि एक पुराने और वफादार दोस्त के नाते भारत को वाशिंगटन की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करनी चाहिए थी। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले भारत ने इस मुद्दे पर बेहद ‘संयमित’ रुख अपनाया। भारत की ओर से जारी आधिकारिक बयान में इस घटनाक्रम को महज ‘चिंता का विषय’ बताया गया। आलोचकों का तर्क है कि भारत का यह रुख उस ऐतिहासिक नींव को कमजोर कर सकता है जो इंदिरा गांधी ने रखी थी, और इससे वैश्विक स्तर पर भारत की ‘विश्वसनीयता’ पर सवाल उठ सकते हैं।

रणनीतिक मजबूरी या क्रेडिबिलिटी का संकट? दिल्ली की दुविधा

इंटरनेशनल कम्युनिटी का एक बड़ा हिस्सा इसे भारत की ओर से वेनेज़ुएला के साथ ‘धोखा’ मान रहा है, लेकिन साउथ ब्लॉक के गलियारों में चर्चा कुछ और है। प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ नहीं होते। वर्तमान में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक समझौतों को लेकर पहले से ही तनाव की स्थिति है। ऐसे में अमेरिका की सार्वजनिक निंदा करना भारत के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँचा सकता था। कूटनीति में सबसे पहले ‘देशहित’ को प्राथमिकता दी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक संतुलित रुख अपनाने का मतलब यह नहीं है कि भारत ने अपने दोस्त को धोखा दिया है, बल्कि यह बदलती विश्व व्यवस्था में अपने हितों की रक्षा करने का एक तरीका है।

भविष्य की चुनौतियां: क्या कायम रहेगी 50 साल पुरानी दोस्ती?

सवाल अब यह है कि क्या भारत अपनी इस ‘शांतिपूर्ण तटस्थता’ की नीति से वेनेज़ुएला जैसे पुराने साथियों का भरोसा कायम रख पाएगा? एक तरफ इंदिरा गांधी की वह विरासत है जिसने भारत को तीसरी दुनिया के देशों का नेता बनाया, और दूसरी तरफ मोदी सरकार की वह कूटनीति है जो अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। भविष्य में भारत की छवि इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने पुराने दोस्तों के मुश्किल समय में उनके साथ कितनी मजबूती से खड़ा होता है।

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