Indian Grand Mufti : यमन में भारतीय नागरिक निमिषा प्रिया को फांसी की सजा से बचाने में भारत के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबकर अहमद ने निर्णायक भूमिका निभाई। जहां भारत सरकार की आधिकारिक कोशिशें यमन सरकार को राजी करने में सीमित रही थीं, वहीं ग्रैंड मुफ्ती ने व्यक्तिगत प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए यमन के धार्मिक और प्रशासनिक अधिकारियों से बात कर निमिषा की फांसी रुकवा दी। मुफ्ती शेख अबूबकर अहमद को कंथापुरम मुसलियार के नाम से भी जाना जाता है। इस मानवीय पहल के चलते वह इस वक्त पूरे देश में सराहे जा रहे हैं।
ग्रैंड मुफ्ती किसी भी देश के इस्लामी न्याय और धर्म आधारित दिशा-निर्देशों के प्रमुख पदाधिकारी होते हैं। भारत में ग्रैंड मुफ्ती का पद सुन्नी मुस्लिम समुदाय में सर्वोच्च धार्मिक पद माना जाता है। ग्रैंड मुफ्ती को फतवा जारी करने का अधिकार होता है और वे किसी सामाजिक या धार्मिक मुद्दे पर निर्णायक राय दे सकते हैं। इनकी बातें न सिर्फ भारत में, बल्कि अन्य मुस्लिम देशों में भी अत्यंत सम्मानपूर्वक सुनी जाती हैं। यही वजह है कि यमन जैसे देश में भी ग्रैंड मुफ्ती की मध्यस्थता कारगर रही।
शेख अबूबकर अहमद भारत के 10वें ग्रैंड मुफ्ती हैं, जिन्हें 24 फरवरी 2019 को इस पद पर नियुक्त किया गया था। उनसे पहले यह पद मोहम्मद अख्तर रजा खान कादरी के पास था, जिनका 2018 में निधन हो गया। ग्रैंड मुफ्ती बनने के लिए इस्लामी ज्ञान की उच्चतम डिग्रियों के साथ-साथ समाजसेवा और धार्मिक प्रतिबद्धता भी ज़रूरी मानी जाती है। इस पद के लिए देश-विदेश के मुस्लिम उलेमा और इस्लामिक संस्थाएं मिलकर निर्णय लेती हैं। चयन प्रक्रिया में केवल उन्हीं व्यक्तियों को तवज्जो दी जाती है जो अपना जीवन इस्लामिक सेवा और प्रचार के लिए समर्पित कर चुके हों।
ग्रैंड मुफ्ती को न सिर्फ धार्मिक मार्गदर्शक बल्कि शांति और सद्भाव के अग्रदूत के रूप में भी देखा जाता है। शेख अबूबकर अहमद ने आतंकवादी संगठन ISIS के खिलाफ भी कड़ा फतवा जारी किया था, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया।
वे पोप फ्रांसिस, भारत के प्रमुख हिंदू धर्मगुरुओं और अन्य धर्मों के नेताओं के साथ अंतरधार्मिक संवाद और शांति मिशनों में भाग लेते हैं। उनके नेतृत्व में भारत का इस्लामी समाज शांति, एकता और कानून व्यवस्था की बात करता है।
भारत जैसे बहुलतावादी देश में जब कोई व्यक्ति इतने बड़े धार्मिक पद पर पहुंचता है और कट्टरवाद के खिलाफ आवाज़ उठाता है, तो उसका प्रभाव न केवल देश में बल्कि दूसरे मुस्लिम देशों में भी गूंजता है। शेख अबूबकर अहमद की यही साख यमन सरकार को बातचीत के लिए तैयार करने में मददगार साबित हुई। उनके संपर्कों और धार्मिक प्रतिष्ठा के कारण ही यमन की सरकार ने उनकी बात को गंभीरता से लिया और फांसी की सजा फिलहाल टाल दी।
निमिषा प्रिया को यमन में एक स्थानीय नागरिक की हत्या के आरोप में सजा-ए-मौत सुनाई गई थी। मामला बेहद संवेदनशील था क्योंकि वह खुद को लंबे समय से उत्पीड़न का शिकार बताती रही हैं। ग्रैंड मुफ्ती की पहल ने यह दिखा दिया कि धर्म के माध्यम से भी कानूनी प्रक्रिया को मानवीय दृष्टिकोण से प्रभावित किया जा सकता है। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि यमन सरकार इस मामले को किस दिशा में ले जाती है। शेख अबूबकर अहमद ने इस घटना से साबित किया कि भारत के ग्रैंड मुफ्ती न केवल धार्मिक मामलों में मार्गदर्शक हैं, बल्कि कूटनीतिक और मानवाधिकार पहलुओं में भी उनका योगदान अहम हो सकता है। इस तरह के उदाहरण बताते हैं कि धर्म और राजनीति के बीच सकारात्मक सहयोग से जिंदगियां बचाई जा सकती हैं और देश की अंतरराष्ट्रीय साख मजबूत की जा सकती है।
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