Rupee vs Dollar
Rupee vs Dollar: भारतीय मुद्रा बाजार (Forex Market) के लिए आज का दिन किसी बड़े झटके से कम नहीं रहा। सोमवार को शुरुआती कारोबार के दौरान भारतीय रुपये ने कमजोरी के सभी पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.14 के सर्वकालिक निचले स्तर (All-time Low) पर जा गिरा। इतिहास में यह पहली बार है जब रुपया 95 के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार निकला है। केवल इस मार्च तिमाही की बात करें, तो रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 4.4% तक कमजोर हो चुका है, जिससे आयातकों और आम जनता की चिंताएं बढ़ गई हैं।
रुपये की गिरती साख को बचाने और बाजार में सट्टेबाजी पर लगाम लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने शुक्रवार को एक सख्त कदम उठाया था। आरबीआई ने बैंकों के लिए ‘नेट ओपन फॉरेक्स पोजीशन’ (Net Open Forex Position) की सीमा को घटाकर $100 मिलियन तय कर दिया है। बैंकों को इस नए नियम को लागू करने के लिए 10 अप्रैल तक का समय दिया गया है। हालांकि, केंद्रीय बैंक का उद्देश्य मुद्रा बाजार में अस्थिरता को रोकना था, लेकिन जानकारों का मानना है कि इतनी कम समय सीमा (Deadline) की वजह से बाजार में घबराहट फैल गई है। बैंक अपनी पोजीशन को आनन-फानन में अनवाइंड (Unwinding) कर रहे हैं, जिसके चलते रुपये पर दबाव और बढ़ गया है।
मुद्रा बाजार में मचे इस कोहराम का सीधा असर सरकारी बॉन्ड मार्केट पर भी देखने को मिला। भारत की 10-वर्षीय बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) आज उछलकर 7.0121% पर पहुँच गई। जुलाई 2024 के बाद यह पहली बार है जब यील्ड ने 7% के महत्वपूर्ण स्तर को पार किया है। बॉन्ड यील्ड में इस बढ़ोतरी का सीधा अर्थ यह है कि अब सरकार के लिए बाजार से कर्ज लेना महंगा हो जाएगा। जब सरकारी उधारी की लागत बढ़ती है, तो इसका असर अंततः बैंकों की ब्याज दरों पर पड़ता है, जिससे आपकी होम लोन या कार लोन की EMI महंगी होने की आशंका बढ़ जाती है।
रुपये की कमजोरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय कारक भी समान रूप से जिम्मेदार हैं। वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $116 प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, और तेल की कीमतों में इस उछाल से देश के व्यापार घाटे (Trade Deficit) के और गहराने की आशंका है। तेल आयात के बिल का भुगतान करने के लिए भारतीय कंपनियों को भारी मात्रा में डॉलर की आवश्यकता होती है, जिससे बाजार में डॉलर की मांग बहुत मजबूत हो गई है और रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है।
डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने का मतलब है कि अब भारत के लिए विदेश से सामान मंगाना महंगा होगा। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, कच्चा तेल और खाद्य तेल जैसी आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। यदि रुपया इसी स्तर पर बना रहता है, तो आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई दर में भी उछाल देखने को मिल सकता है। आयातकों के लिए मार्जिन कम हो रहा है, जिसका बोझ अंततः अंतिम उपभोक्ता यानी आम आदमी की जेब पर ही पड़ेगा।
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