Rupee vs Dollar
Rupee vs Dollar : भारतीय मुद्रा बाजार के लिए शुक्रवार का दिन बेहद निराशाजनक रहा। मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में बढ़ते युद्ध के तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी उछाल ने भारतीय रुपये की कमर तोड़ दी है। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया शुक्रवार को अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 94.82 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। दिन की शुरुआत 94.18 पर हुई थी, लेकिन वैश्विक दबाव के चलते यह संभल नहीं सका और पिछले रिकॉर्ड 93.96 के स्तर को पार करते हुए ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की। इस गिरावट ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
रुपये में आई इस बड़ी गिरावट के बाद देश में राजनीतिक पारा भी चढ़ गया है। मुख्य विपक्षी दल इंडियन नेशनल कांग्रेस ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा है। कांग्रेस ने प्रधानमंत्री का एक पुराना वीडियो साझा करते हुए सवाल उठाया कि अब रुपये की साख कहां गई? पार्टी का आरोप है कि सरकार की गलत आर्थिक नीतियों और कमजोर प्रबंधन के कारण रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। कांग्रेस के अनुसार, गिरता रुपया देश की आर्थिक कमजोरी का प्रतीक है, जबकि सरकार इसे केवल वैश्विक कारणों का हवाला देकर टाल रही है।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, रुपये के टूटने के पीछे तीन मुख्य कारण हैं। पहला, मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव, जिससे वैश्विक निवेशक सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर की ओर भाग रहे हैं। दूसरा, डॉलर इंडेक्स का दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत होना। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) द्वारा भारतीय बाजार से लगातार की जा रही बिकवाली है। विदेशी निवेशक अनिश्चितता के माहौल में भारतीय बाजार से अपना पैसा निकालकर अमेरिकी डॉलर में निवेश कर रहे हैं, जिससे रुपये की मांग घट रही है।
मुद्रा बाजार की इस अस्थिरता का सीधा असर घरेलू शेयर बाजार पर भी दिखाई दिया। शुक्रवार को शेयर बाजार में ‘ब्लैक फ्राइडे’ जैसा नजारा रहा। BSE Sensex 1,690 अंक यानी 2.2% की भारी गिरावट के साथ 73,583 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं, Nifty 50 भी 487 अंक टूट गया। इस भीषण बिकवाली के कारण महज एक दिन में निवेशकों की करीब 8.5 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति स्वाहा हो गई। बाजार में फैली इस घबराहट की मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर छाई अनिश्चितता और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें बढ़कर 109.8 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 80% तेल आयात करता है, ऐसे में कच्चा तेल महंगा होने और रुपया कमजोर होने का दोहरा झटका महंगाई के रूप में लगेगा। इससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं, जिसका सीधा असर परिवहन लागत और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर पड़ेगा। इसके अलावा, विदेश में पढ़ने वाले छात्रों और विदेश यात्रा करने वाले पर्यटकों के लिए खर्च काफी बढ़ जाएगा, क्योंकि उन्हें अब हर डॉलर के लिए अधिक रुपये चुकाने होंगे।
हालांकि, रुपये की गिरावट हर किसी के लिए बुरी खबर नहीं है। भारत के निर्यात क्षेत्र, विशेष रूप से IT, फार्मा और टेक्सटाइल के लिए यह फायदेमंद साबित हो सकता है। चूंकि निर्यातकों को भुगतान अमेरिकी डॉलर में मिलता है, इसलिए रुपया कमजोर होने पर उन्हें विनिमय (Exchange) के बाद अधिक भारतीय रुपये प्राप्त होंगे। इससे उनकी लाभप्रदता (Profitability) बढ़ेगी। लेकिन जब तक पश्चिम एशिया में शांति नहीं होती और तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक रुपये पर दबाव कम होने की उम्मीद कम ही है।
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