Rupee vs Dollar: वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी उछाल ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। शुक्रवार, 20 मार्च 2026 को भारतीय रुपया इतिहास के अपने सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। विदेशी मुद्रा बाजार में मची इस हलचल ने निवेशकों और आम जनता की चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम नहीं होता है, तो आने वाले दिनों में भारतीय मुद्रा पर दबाव और अधिक बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर देश की जीडीपी और राजकोषीय घाटे पर पड़ेगा।

रुपये की ऐतिहासिक गिरावट: डॉलर के मुकाबले ₹93.08 का स्तर
शुक्रवार सुबह जब इंटरबैंक फॉरेक्स मार्केट खुला, तो रुपये की शुरुआत ही कमजोरी के साथ हुई। रुपया 92.92 के स्तर पर खुला और कुछ ही घंटों के भीतर इसने ₹93 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर लिया। कारोबार के दौरान एक समय ऐसा आया जब रुपया टूटकर 93.08 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले 18 मार्च को रुपया 92.63 के स्तर पर था, लेकिन महज दो दिनों के भीतर आई इस बड़ी गिरावट ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यह गिरावट दर्शाती है कि वैश्विक अनिश्चितता के बीच निवेशक डॉलर को एक सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग ने बिगाड़ा गणित
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का सीधा असर रुपये की सेहत पर पड़ता है। मध्य पूर्व में तेल रिफाइनरियों और रणनीतिक ठिकानों पर हुए हालिया हमलों के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंची थीं। हालांकि शुक्रवार को इसमें मामूली सुधार देखा गया और यह 107 डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा था, लेकिन लंबी अवधि में तेल का महंगा होना भारत के आयात बिल को बढ़ा रहा है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है और रुपया कमजोर हो रहा है।
विदेशी निवेशकों की निकासी: जनवरी 2025 के बाद सबसे बड़ा पलायन
भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का भरोसा डगमगाता दिख रहा है। मार्च के महीने में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से 8 अरब डॉलर से अधिक की पूंजी निकाल ली है। अकेले गुरुवार को ही ₹7,500 करोड़ से अधिक की शुद्ध बिकवाली दर्ज की गई, जो जनवरी 2025 के बाद की सबसे बड़ी निकासी है। जब विदेशी निवेशक अपना पैसा निकालते हैं, तो वे शेयरों को बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे बाजार में डॉलर की किल्लत हो जाती है और रुपया और अधिक गिर जाता है।
शेयर बाजार में विरोधाभासी मजबूती: सेंसेक्स 75,000 के पार
एक तरफ जहाँ रुपया कमजोर हो रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय शेयर बाजार ने शुक्रवार को शानदार रिकवरी दिखाई। बैंकिंग और आईटी सेक्टर में हुई खरीदारी के दम पर सेंसेक्स करीब 960 अंक चढ़कर 75,000 के महत्वपूर्ण स्तर को पार कर गया। इसी तरह निफ्टी भी 300 अंकों से ज्यादा उछलकर बंद हुआ। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह मजबूती घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) के भरोसे के कारण है, जो विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद बाजार को थामे हुए हैं। हालांकि, मुद्रा की कमजोरी अंततः कॉर्पोरेट मुनाफे पर असर डाल सकती है।
आम आदमी की जेब पर असर और भविष्य का अनुमान
रुपये के कमजोर होने का सबसे बड़ा खामियाजा आम आदमी को ‘महंगाई’ के रूप में भुगतना पड़ता है। आयात महंगा होने से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन और खाद जैसी आयातित वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि रुपया 93 के ऊपर टिका रहता है, तो यह जल्द ही 93.40 के स्तर को छू सकता है। फिलहाल 92.70 का स्तर एक मजबूत सपोर्ट के रूप में देखा जा रहा है।
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