Indian Worker Deaths
Indian Worker Deaths : विदेशों में बेहतर भविष्य और ऊँची कमाई के सपने लेकर जाने वाले भारतीय कामगारों के लिए स्थितियाँ बेहद चिंताजनक होती जा रही हैं। हाल ही में विदेश मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले पाँच वर्षों में विदेश में काम करने वाले औसतन 20 भारतीय कामगारों की हर दिन मौत हुई है। यह स्थिति उस समय और भी संवेदनशील हो जाती है जब मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में युद्ध और अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। भारतीय कामगारों की सुरक्षा और उनके जीवन के अधिकार पर अब बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।
विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने संसद में विपक्ष के एक लिखित सवाल के जवाब में जो जानकारी दी है, वह किसी को भी विचलित कर सकती है। उनके अनुसार, वर्ष 2021 से 2025 के बीच कुल 37,740 भारतीय कामगारों ने अपनी जान गंवाई। यदि साल दर साल इसका विश्लेषण करें, तो 2021 में सबसे अधिक 8,234 मौतें दर्ज की गईं। हालांकि 2022 में यह आंकड़ा गिरकर 6,614 पर आया, लेकिन इसके बाद इसमें फिर से उछाल देखा गया। 2023 में 7,921, 2024 में 7,747 और 2025 में 7,854 मौतों ने यह साबित कर दिया कि यह संकट कम होने के बजाय लगातार बढ़ रहा है।
हैरान करने वाली बात यह है कि कुल मौतों में से लगभग 86 प्रतिशत केवल पश्चिम एशियाई (खाड़ी) देशों में हुई हैं। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इस सूची में सबसे ऊपर है, जहाँ 12,380 भारतीयों की जान गई। इसके ठीक बाद सऊदी अरब का स्थान है, जहाँ 11,757 मौतें दर्ज की गईं। यह आंकड़े बताते हैं कि रेगिस्तानी देशों के कठोर वातावरण और वहां के श्रम कानूनों की जटिलताओं के बीच भारतीय श्रमिक अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। खाड़ी देशों में मौतों की बढ़ती दर वैश्विक औसत से भी अधिक डरावनी है।
सिर्फ मौतें ही नहीं, बल्कि जीवित बचे कामगारों के हालात भी सुगम नहीं हैं। पिछले पांच सालों में भारतीय उच्चायोगों (High Commissions) में कार्यस्थल पर उत्पीड़न और शोषण की 80,985 शिकायतें दर्ज की गईं। शिकायतों के मामले में भी संयुक्त अरब अमीरात (16,965 शिकायतें) शीर्ष पर रहा, जिसके बाद कुवैत और सऊदी अरब का नंबर आता है। ये शिकायतें वेतन न मिलने, पासपोर्ट जब्त करने, खराब आवासीय स्थितियों और शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना से संबंधित हैं।
कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि यह समस्या समय के साथ और विकराल हुई है। 2012 से 2018 के बीच खाड़ी देशों में हर दिन औसतन 10 भारतीयों की मौत होती थी, जो 2021 से 2025 के बीच बढ़कर 18 हो गई है। वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 20 मौतें प्रतिदिन तक पहुँच गया है। यह वृद्धि दर्शाती है कि सुरक्षा उपायों और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थितियाँ नहीं बदली हैं।
सरकार का दावा है कि वह इन मुद्दों पर गंभीर है। विदेश राज्य मंत्री के अनुसार, शिकायत प्राप्त होते ही स्थानीय प्रशासन के माध्यम से त्वरित कार्रवाई की जाती है। भारत ने विभिन्न देशों के साथ श्रम और जनशक्ति सहयोग पर ‘मैमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MoU) भी हस्ताक्षरित किए हैं ताकि कामगारों के हितों की रक्षा की जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कागजी समझौतों से काम नहीं चलेगा; सरकार को विदेशी धरती पर अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए और अधिक प्रभावी हस्तक्षेप और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल सुनिश्चित करने होंगे।
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