Indigo High Court
Indigo High Court:देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो (IndiGo) एक बार फिर बड़े विवाद को लेकर सुर्खियों में है। इस बार मामला यात्रियों या उड़ानों में देरी का नहीं, बल्कि लगभग 900 करोड़ रुपये के कस्टम ड्यूटी रिफंड से जुड़ा है। इंडिगो की पैरेंट कंपनी, इंटरग्लोब एविएशन लिमिटेड, ने विमान के इंजन और अन्य पुर्जों पर कथित तौर पर ‘डबल टैक्सेशन’ के खिलाफ आवाज उठाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। कंपनी का दावा है कि एक ही वस्तु पर दो बार टैक्स लगाना न केवल गलत है, बल्कि यह असंवैधानिक भी है।
इंडिगो के विवाद का मूल कारण उन विमान इंजन और पुर्जों पर लगाई गई कस्टम ड्यूटी है, जिन्हें मरम्मत के लिए विदेश भेजा जाता है और फिर भारत वापस लाया जाता है। एयरलाइन का पक्ष यह है कि इन पुर्जों की भारत वापसी को ‘नई खरीद (Fresh Import)’ नहीं माना जा सकता, क्योंकि ये मूल रूप से भारत के ही थे और केवल मरम्मत के उद्देश्य से बाहर गए थे।
इसके बावजूद, कस्टम विभाग ने इन मरम्मत किए गए पुर्जों को नया आयात मानते हुए इन पर दोबारा भारी-भरकम शुल्क वसूल लिया। एयरलाइन ने तर्क दिया है कि यह वसूली न सिर्फ नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे कंपनी पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ा है।
इंडिगो की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वे पहले ही इन पुर्जों के ‘री-इम्पोर्ट’ (पुनः आयात) के समय बेसिक कस्टम ड्यूटी (Basic Custom Duty) का भुगतान कर चुके थे। इसके अतिरिक्त, विदेश में की गई मरम्मत एक ‘सर्विस’ (सेवा) के दायरे में आती है, जिसके लिए कंपनी ने रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म (Reverse Charge Mechanism) के तहत वस्तु एवं सेवा कर (GST) का भुगतान भी किया है।
एयरलाइन का आरोप है कि इन सभी शुल्कों के भुगतान के बावजूद, कस्टम अधिकारियों ने दोबारा शुल्क लगाने की मांग की, जिसे कंपनी डबल टैक्सेशन मान रही है। इस दोहरे कराधान को इंडिगो ने राजस्व अधिकारियों की मनमानी बताया है, जिसने उन्हें कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर किया है।
कंपनी के वरिष्ठ अधिवक्ता वी. लक्ष्मीकुमारन ने कोर्ट को बताया कि इस तरह की वसूली को पहले भी कस्टम, एक्साइज और सर्विस टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (CESTAT) द्वारा गलत ठहराया जा चुका है। ट्रिब्यूनल ने अपने पूर्व के फैसलों में यह स्पष्ट किया था कि मरम्मत के बाद देश में वापस लाए गए सामान पर दोबारा कस्टम ड्यूटी नहीं लगाई जा सकती।
वकील ने तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल के स्पष्ट न्यायिक दृष्टिकोण के बावजूद, कस्टम अधिकारियों ने कंपनी को बकाया रिफंड नहीं दिया। इसी वजह से, न्याय पाने के लिए इंडिगो को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा है। यह मामला एक तरह से न्यायिक फैसलों के पालन में सरकारी विभागों की विफलता को भी दर्शाता है।
शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई हुई, लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आया। सुनवाई कर रही जजों में से एक जस्टिस शैल जैन ने इस मामले से खुद को अलग करने का फैसला किया।
जस्टिस जैन ने स्पष्ट किया कि उनके बेटे इंडिगो एयरलाइन में पायलट के पद पर कार्यरत हैं, और इसलिए हितों के टकराव (Conflict of Interest) की संभावना से बचने के लिए, वह इस केस पर कोई फैसला नहीं देंगी। अब यह मामला सुनवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाएगा, जो इसे किसी दूसरी बेंच को सौंपेंगे। इस वजह से, ₹900 करोड़ के इस अहम टैक्स विवाद पर फैसले में फिलहाल और देरी होगी।
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