Indore Contaminated Water
Indore Contaminated Water: मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में पिछले कुछ दिनों में मातम पसर गया है। दूषित पानी पीने के कारण यहाँ 15 मासूम जिंदगियां खत्म हो गई हैं। अब, जब मौतों का आंकड़ा दहाई पार कर गया, तब जाकर प्रशासन की नींद खुली है और उस पाइपलाइन को बिछाने का काम शुरू हुआ है जो पिछले तीन सालों से फाइलों में दबी हुई थी। यह स्थिति उस विकासशील शहर की है जिसे स्वच्छता और प्रबंधन में देश का सिरमौर माना जाता है।
भागीरथपुरा में नर्मदा पाइपलाइन बिछाने के प्रोजेक्ट को साल 2022 में ही मंजूरी मिल गई थी। 2.4 करोड़ रुपये की लागत वाला यह प्रोजेक्ट दो चरणों में पूरा होना था। यदि यह पाइपलाइन समय पर बिछ जाती, तो 27 साल पुरानी जर्जर पाइपलाइन से हो रहा दूषित पानी का रिसाव लोगों के घरों तक नहीं पहुँचता। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक विफलता है। आज गलियों में चल रही जेसीबी मशीनों की आवाज विकास का शोर नहीं, बल्कि उन 15 लोगों की चीख है जिन्हें बचाया जा सकता था।
नगर निगम प्रशासन की नाकामी का आलम यह था कि जुलाई 2022 में टेंडर जारी होने के बावजूद पहले फेज का काम आज तक अधूरा है। नवंबर 2022 में महापौर परिषद ने इसे मंजूरी दी, लेकिन अपर आयुक्त के हस्ताक्षर होने में ही ढाई महीने लग गए। हैरानी की बात यह है कि दूसरे चरण की तैयारी नवंबर 2024 में हो चुकी थी, लेकिन 9 महीने तक टेंडर ही जारी नहीं किया गया। इसी बीच, पुरानी पाइपलाइन में लीकेज बढ़ता गया और मौत का सामान घर-घर पहुँच गया।
दिसंबर के अंतिम 10 दिनों में दूषित पानी ने ऐसा कहर बरपाया कि अस्पतालों में मरीजों की लाइन लग गई। जब 10 मौतें हो चुकी थीं, तब 31 दिसंबर 2025 को आनन-फानन में टेंडर खोलकर वर्क ऑर्डर जारी किया गया। 30 दिसंबर को जब अपर आयुक्त रोहित सिसोदिया ने फाइल पर हस्ताक्षर किए, तब तक शहर अपनी चार अनमोल जान खो चुका था। आज भागीरथपुरा की सड़कों पर पाइप के ढेर लगे हैं, लेकिन यह कार्रवाई ‘देर आए दुरुस्त आए’ नहीं, बल्कि जन-दबाव और मौतों के डर का नतीजा है।
इस बड़ी त्रासदी के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर कड़ी कार्रवाई की गई है। फाइलों को 8 महीने तक रोक कर रखने वाले नगर निगम कमिश्नर दिलीप यादव को उनके पद से हटा दिया गया है। साथ ही अपर आयुक्त रोहित सिसोदिया और जल वितरण विभाग के इंजीनियर संजीव श्रीवास्तव को सस्पेंड कर दिया गया है। सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि जनहानि के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को बख्शा नहीं जाएगा, हालांकि क्षेत्र की जनता इसे नाकाफी मान रही है।
भले ही नई पाइपलाइन का काम युद्धस्तर पर शुरू हो गया हो, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। क्षेत्र के 208 मरीज अब भी अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें से 27 की हालत नाजुक बनी हुई है। क्षेत्र में रहने वाले हजारों लोग अब भी दहशत में हैं और पीने के पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर हैं। भागीरथपुरा की यह घटना एक सबक है कि फाइलों की सुस्ती और अफसरों की अनदेखी कैसे एक पूरी बस्ती को श्मशान में बदल सकती है।
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