International Women’s Day 2026: हर साल 8 मार्च का दिन पूरी दुनिया में ‘इंटरनेशनल विमेंस डे’ के रूप में मनाया जाता है। यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि उन महिलाओं के अदम्य साहस, संघर्ष और सफलता को याद करने का अवसर है, जिन्होंने पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियों को तोड़कर इतिहास रचा। आज भले ही हम महिलाओं को हर क्षेत्र में नेतृत्व करते देखते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका जैसे क्षेत्रों में महिलाओं का प्रवेश लगभग नामुमकिन माना जाता था। इस महिला दिवस पर, आइए हम भारत की उन ‘पहली’ महिलाओं के बारे में जानते हैं जिन्होंने पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्रों में अपनी धाक जमाई और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं।
प्रशासन की मिसाल: अन्ना राजम मल्होत्रा (भारत की पहली महिला IAS)
अन्ना राजम मल्होत्रा का नाम भारतीय प्रशासनिक सेवा के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। साल 1951 में जब उन्होंने IAS ज्वाइन किया, तब महिलाओं के लिए यह रास्ता कांटों भरा था। उनके चयन के समय इंटरव्यू बोर्ड ने उन्हें कोई अन्य सेवा चुनने की सलाह दी थी, क्योंकि उन्हें लगा था कि एक महिला इस कठिन जिम्मेदारी को नहीं निभा पाएगी। लेकिन अन्ना ने हार नहीं मानी। उन्होंने मद्रास कैडर में अपनी सेवाएं दीं और 1982 के एशियन गेम्स के सफल आयोजन में अहम भूमिका निभाई। उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1989 में ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया।
खाकी में साहस: किरण बेदी (भारत की पहली महिला IPS)
भारतीय पुलिस सेवा (IPS) का जिक्र होते ही सबसे पहला नाम किरण बेदी का आता है। 1972 में वह इस सेवा में शामिल होने वाली देश की पहली महिला बनीं। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान ‘कड़क’ छवि और अनुशासन के नए मानक स्थापित किए। दिल्ली में ट्रैफिक मैनेजमेंट हो या तिहाड़ जेल के भीतर किए गए ऐतिहासिक सुधार, किरण बेदी ने हर चुनौती को डटकर स्वीकारा। तिहाड़ जेल में कैदियों के पुनर्वास के लिए किए गए उनके कार्यों के कारण उन्हें 1994 में प्रतिष्ठित ‘रेमन मैग्सेसे’ पुरस्कार मिला। पुलिस सेवा के बाद उन्होंने राजनीति और संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशनों में भी अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया।
न्याय की आवाज: अन्ना चांडी (भारत की पहली महिला हाई कोर्ट जज)
न्यायपालिका के क्षेत्र में अन्ना चांडी ने उस दौर में कदम रखा जब अदालतों में महिलाओं की उपस्थिति न के बराबर थी। वह 1959 में केरल हाई कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश नियुक्त की गईं। इससे पहले उन्होंने देश की पहली महिला न्यायिक अधिकारी बनने का गौरव भी हासिल किया था। अन्ना चांडी ने न केवल कानूनी फैसलों में अपनी विशेषज्ञता दिखाई, बल्कि वे महिला अधिकारों और समाज में लिंग समानता की एक मुखर आवाज भी बनीं। उनके योगदान ने भारतीय कानूनी तंत्र में महिलाओं के प्रवेश के बंद दरवाजे खोल दिए।
आसमान की उड़ान: सरला ठकराल (देश की पहली महिला पायलट)
जिस दौर में महिलाएं घर की दहलीज पार करने से डरती थीं, उस समय सरला ठकराल ने आसमान नापने का फैसला किया। साल 1936 में महज 21 साल की उम्र में उन्होंने पायलट का लाइसेंस हासिल किया और साड़ी पहनकर अकेले विमान उड़ाकर दुनिया को चौंका दिया। लाहौर फ्लाइंग क्लब से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने 1000 घंटे की उड़ान पूरी की। हालांकि, दूसरे विश्व युद्ध और निजी जीवन की त्रासदियों के कारण उनका कमर्शियल पायलट बनने का सफर रुका, लेकिन उन्होंने कला और फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में अपनी एक नई पहचान बनाई। सरला ठकराल आज भी करोड़ों लड़कियों के लिए ऊंची उड़ान भरने की प्रेरणा हैं।
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