New IRGC Leadership: भारतीय पौराणिक आख्यानों में ‘रक्तबीज’ नाम के एक ऐसे असुर का वर्णन मिलता है, जिसके शरीर से गिरने वाली खून की हर बूंद एक नए और उतने ही शक्तिशाली योद्धा को जन्म देती थी। वर्तमान में अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे भीषण युद्ध में ईरान की स्थिति कुछ वैसी ही नजर आ रही है। पश्चिमी शक्तियां एक-एक करके ईरान के तमाम बड़े जनरलों, मंत्रियों और रणनीतिकारों को निशाना बना रही हैं, लेकिन ईरान का रक्षा तंत्र टूटने के बजाय और अधिक कट्टर और घातक होता जा रहा है। मार्कंडेय पुराण की उस कथा की तरह, जहाँ रक्तबीज के वध के लिए मां काली को अवतार लेना पड़ा था, आज ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) एक ऐसी संस्था बन चुकी है जो हर मौत के बाद एक नया नेतृत्व खड़ा कर देती है।

पौराणिक आख्यान और ईरान की जमीनी हकीकत: रक्तबीज का सिद्धांत
दुर्गा सप्तशती के अनुसार, शुंभ-निशुंभ के सेनापति रक्तबीज को वरदान था कि उसकी बूंद-बूंद से नया असुर पैदा होगा। ईरान में भी यही स्थिति दिख रही है। अमेरिका और इजरायल को लगा था कि शीर्ष नेतृत्व को खत्म करने से जंग रुक जाएगी, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के बाद उनके बेटे मोज्तबा खामेनेई ने कमान संभाली, जो अपने पिता से भी अधिक आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। इसी तरह, सेना प्रमुख अब्दुल रहीम मौसवी और IRGC के कमांडर मोहम्मद पकपुर के मारे जाने के बाद नई पीढ़ी के जनरलों ने मोर्चा संभाल लिया है, जो सीधे हमले की नीति पर यकीन रखते हैं।
संस्थागत ढांचा: व्यक्तियों की मौत से नहीं रुकता ईरान का तंत्र
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में स्पष्ट किया कि ईरान का सिस्टम किसी एक व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह संस्थागत (Institutional) आधार पर चलता है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि वे खुद भी मारे जाते हैं, तो उनकी जगह लेने के लिए दूसरा व्यक्ति तैयार है। पिछले 20 वर्षों में ईरान ने खुद को इस तरह तैयार किया है कि पुराने नेतृत्व के जाने से पैदा होने वाले शून्य को तत्काल IRGC के कट्टरपंथी जनरल भर देते हैं। रक्षा मंत्री अजीज नसीरजादेह की जगह सैयद माजिद इब्न अल रजा का आना और अली लारिजानी जैसे दिग्गजों की कमी को संगठन द्वारा तुरंत पूरा करना इसी ‘रक्तबीज’ रणनीति का हिस्सा है।
ईरान की नई लीडरशिप: पहले से कहीं अधिक कट्टर और आक्रामक
युद्ध के मैदान में जो नया नेतृत्व उभर रहा है, वह पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक कट्टर और समझौता न करने वाला है। नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के मुखिया अली लारिजानी, डिफेंस काउंसिल के मुखिया अली शामखानी और बसीज कमांडर घोलामरेज़ा सोलेमानी जैसे दिग्गजों की मौत ने ईरान के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला को और भड़का दिया है। इंटेलिजेंस और पुलिस विभागों के प्रमुखों की हत्या के बावजूद ईरान ने झुकने से इनकार कर दिया है। नई लीडरशिप सीधे इजरायली और अमेरिकी ठिकानों पर ‘टैक्टिकल’ हमले करने की योजना पर काम कर रही है, जिससे युद्ध का स्वरूप और भी भयानक हो गया है।
अमेरिका और इजरायल के सामने दोहरी चुनौती: क्या है भविष्य?
अब सवाल यह है कि यह जंग खत्म कैसे होगी? अमेरिका और इजरायल के पास केवल दो विकल्प बचे हैं। पहला—इस जंग को तब तक जारी रखा जाए जब तक ईरान पूरी तरह आत्मसमर्पण न कर दे। लेकिन इसमें खतरा यह है कि लंबी जंग से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति ठप हो जाएगी, जो दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की ओर धकेल सकती है। दूसरा विकल्प—आमने-सामने की जमीनी जंग (Ground War)। हालांकि, वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान के कड़वे अनुभवों को देखते हुए अमेरिका जानता है कि ईरान की धरती पर कदम रखना उसके लिए एक ऐसे दलदल में फंसने जैसा होगा, जहाँ से वापसी का रास्ता केवल तबाही की ओर जाता है।
निष्कर्ष: विचारधारा की जंग में हथियारों की सीमा
ईरान में जो लोग मारे जा रहे हैं, वे केवल सैनिक नहीं बल्कि एक विचारधारा के वाहक हैं। अमेरिका और इजरायल जिस ‘टारगेटेड किलिंग’ के जरिए जीत की उम्मीद कर रहे हैं, वह फिलहाल नाकाम साबित हो रही है। जब तक एक नेता के जाने पर दस नए लड़ाके तैयार होते रहेंगे, तब तक यह आधुनिक ‘रक्तबीज’ का संघर्ष थमता नजर नहीं आता। ईरान ने साबित कर दिया है कि वह किसी भी कीमत पर झुकने को तैयार नहीं है, चाहे इसके लिए उसे अपनी पूरी लीडरशिप की आहुति ही क्यों न देनी पड़े।
Read More : Iran Spy Network: ईरान में जासूसी नेटवर्क पर सर्जिकल स्ट्राइक, 111 रॉयल सेल्स और जासूसी नेटवर्क ध्वस्त


















