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Hormuz Strait Crisis: होर्मुज जलडमरूमध्य में इंटरनेट केबल्स पर मंडराया खतरा, वैश्विक डिजिटल संकट की चेतावनी

Hormuz Strait Crisis: मध्य पूर्व में इज़राइल और ईरान के बीच गहराता सैन्य संघर्ष अब केवल ज़मीनी सीमाओं या तेल की आपूर्ति तक सीमित नहीं रह गया है। इस युद्ध की तपिश ने अब उस अदृश्य जाल को भी अपनी ज़द में ले लिया है जिसके बिना आधुनिक दुनिया की कल्पना करना असंभव है—’अंडरसी इंटरनेट केबल्स’। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जो वैश्विक तेल व्यापार का मुख्य मार्ग है, अब डिजिटल दुनिया की सबसे कमज़ोर कड़ी बनकर उभरा है। समुद्र की गहराई में बिछी ये फाइबर ऑप्टिक केबल्स वैश्विक इंटरनेट नेटवर्क की जीवनरेखा हैं, जिन पर अब युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक इंटरनेट का महामार्ग

समुद्र की सतह से करीब 200 फीट नीचे बिछी ये केबल्स वीडियो कॉल, बैंकिंग ट्रांजैक्शन और क्लाउड सेवाओं के लिए डेटा ले जाने का काम करती हैं। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी करने से न केवल ईंधन की किल्लत होने का डर है, बल्कि वैश्विक डिजिटल कनेक्टिविटी के टूटने का खतरा भी पैदा हो गया है। यहाँ से 20 से अधिक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय केबल्स गुजरती हैं, जो यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बीच डेटा ट्रैफिक को आपस में जोड़ती हैं। इनमें AAE-1, FALCON, Gulf Bridge International, और Tata-TGN Gulf जैसी केबल्स शामिल हैं, जो वैश्विक संचार का मुख्य आधार हैं।

डिजिटल ब्लैकआउट का खतरा और वैश्विक असर

हालांकि ईरान सीधे तौर पर दुनिया का इंटरनेट पूरी तरह बंद नहीं कर सकता, लेकिन इन केबल्स को भौतिक नुकसान पहुँचाकर वह वैश्विक अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दे सकता है। यदि इन अंडरसी केबल्स को क्षति पहुँचती है, तो एशिया और यूरोप के बीच डेटा ट्रांसफर की गति में भारी गिरावट आएगी। इससे न केवल इंटरनेट धीमा होगा, बल्कि बड़ी टेक कंपनियों की क्लाउड सेवाओं और अंतरराष्ट्रीय डिजिटल व्यापार पर दबाव असहनीय हो जाएगा।

भारतीय इंटरनेट नेटवर्क पर पड़ने वाला प्रभाव

भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि भारत की अधिकांश अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्टिविटी पर्शियन गल्फ और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्तों पर निर्भर है। यदि इन केबल्स के साथ छेड़छाड़ होती है या युद्ध के कारण वे कट जाती हैं, तो भारत में इंटरनेट की स्पीड नाटकीय रूप से कम हो सकती है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कॉल, ऑनलाइन बैंकिंग सेवाएं और एआई (AI) आधारित तकनीकी प्लेटफॉर्म्स के बाधित होने की प्रबल संभावना है, जिसका सीधा असर भारत के आईटी सेक्टर पर पड़ेगा।

युद्ध के बीच केबल्स की मरम्मत एक बड़ी चुनौती

समुद्र के नीचे कटी हुई केबल्स को जोड़ना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए विशेष जहाजों और अत्याधुनिक रोबोटिक तकनीक की आवश्यकता होती है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में बीमा कंपनियां और मरम्मत करने वाले जहाज जाने से कतराते हैं, जिससे छोटी सी खराबी को ठीक करने में भी महीनों का समय लग जाता है। बीते साल लाल सागर (Red Sea) में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण हुए नुकसान ने पहले ही यह साबित कर दिया है कि युद्ध की स्थिति में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर कितना असुरक्षित है।

बैकअप प्लान की सीमाएं और भविष्य का संकट

विश्व के पास डेटा डायवर्ट करने के कुछ वैकल्पिक रास्ते मौजूद तो हैं, लेकिन वे मुख्य रूट्स की तरह प्रभावी नहीं हैं। वैकल्पिक रास्तों से डेटा भेजने पर ‘लैटेंसी’ (देरी) बढ़ जाती है, जिससे रियल-टाइम सेवाएं ठप हो सकती हैं। यदि होर्मुज और लाल सागर दोनों मार्ग एक साथ बाधित होते हैं, तो यह एक वैश्विक डिजिटल आपदा का रूप ले लेगा। इसका असर केवल तकनीक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्वास्थ्य सेवा, वैश्विक बैंकिंग और अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भी अफरा-तफरी मच जाएगी।

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