अंतरराष्ट्रीय

Iran Crisis: राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और IRGC के बीच ‘महायुद्ध’, सर्वोच्च नेता के गायब होने से बढ़ा सस्पेंस

Iran Crisis : इजरायल और अमेरिका के साथ जारी भीषण युद्ध के बीच ईरान अब एक दोहरे संकट से जूझ रहा है। सीमा पर चल रही जंग के साथ-साथ देश के भीतर सत्ता पर कब्जे को लेकर जबरदस्त खींचतान मची हुई है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और वहां की ताकतवर सैन्य इकाई ‘इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर्प्स’ (IRGC) के बीच शीत युद्ध छिड़ गया है। ‘ईरान इंटरनेशनल’ की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट बताती है कि उदारवादी छवि वाले राष्ट्रपति पेजेशकियान की भूमिका अब केवल नाममात्र की रह गई है, जबकि देश के असली फैसले आईआरजीसी के जनरलों द्वारा लिए जा रहे हैं।

राष्ट्रपति के संवैधानिक अधिकारों पर IRGC का प्रहार

ईरान की जटिल राजनीतिक व्यवस्था में राष्ट्रपति को प्रशासनिक प्रमुख माना जाता है, लेकिन वर्तमान युद्धकालीन परिस्थितियों ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया है। सूत्रों के अनुसार, राष्ट्रपति पेजेशकियान इस समय पूरी तरह से राजनीतिक गतिरोध में फंस गए हैं। आईआरजीसी ने न केवल महत्वपूर्ण सरकारी फैसलों में हस्तक्षेप शुरू कर दिया है, बल्कि कई अहम नियुक्तियों को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है। आलम यह है कि निर्वाचित राष्ट्रपति के अधिकार अब लगभग निष्प्रभावी (Deadlocked) हो गए हैं और सेना ने प्रशासन की डोर अपने हाथों में ले ली है।

खुफिया मंत्री की नियुक्ति पर टकराव और वहीदी का दबदबा

सत्ता संघर्ष का सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में ईरानी खुफिया मंत्री की नियुक्ति के दौरान देखने को मिला। संवैधानिक परंपरा के अनुसार, इस पद के लिए राष्ट्रपति नाम प्रस्तावित करते हैं। पेजेशकियान ने अनुभवी हुसैन देहगान का नाम सुझाया था, लेकिन आईआरजीसी ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईआरजीसी के शीर्ष कमांडर अहमद वहीदी ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि युद्ध जैसे संवेदनशील समय में महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों का वीटो पावर केवल सेना के पास रहेगा। इस अड़ंगेबाजी के कारण राष्ट्रपति के पास अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के नाम वापस लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

सुप्रीम लीडर की रहस्यमयी स्थिति का लाभ

ईरान में आमतौर पर अंतिम निर्णय सुप्रीम लीडर की मंजूरी से होता है। हालांकि, वर्तमान में नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की स्थिति और उनकी सटीक लोकेशन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी अनिश्चितता बनी हुई है। आईआरजीसी ने इसी अस्थिरता का फायदा उठाकर देश के सुरक्षा तंत्र पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। कहा जा रहा है कि मुज्तबा खामेनेई के आसपास सेना ने एक ऐसा सुरक्षा घेरा (Cordon) बना दिया है, जिसे भेद पाना सरकार के मंत्रियों के लिए भी नामुमकिन हो गया है। इस स्थिति ने आईआरजीसी को एक अघोषित ‘सुपर-पावर’ बना दिया है।

मिलिट्री काउंसिल का उदय और राष्ट्रपति की अनदेखी

‘ईरान इंटरनेशनल’ का दावा है कि तेहरान में इस वक्त एक अनौपचारिक ‘मिलिट्री काउंसिल’ सक्रिय हो गई है। इसमें आईआरजीसी के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी शामिल हैं जो युद्ध और आंतरिक सुरक्षा से जुड़े सभी बड़े फैसले ले रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि राष्ट्रपति पेजेशकियान को इन फैसलों की प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है। यहां तक कि राष्ट्रपति ने कई बार सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई से मुलाकात करने और देश की स्थिति पर चर्चा करने की कोशिश की, लेकिन सेना के कड़े पहरे के कारण उनकी मुलाकात संभव नहीं हो सकी। सरकारी रिपोर्ट्स भी अब सीधे सुप्रीम लीडर तक नहीं पहुंच पा रही हैं।

ईरान के भविष्य पर मंडराता सैन्य शासन का खतरा

बाहरी दुश्मनों से लड़ रहे ईरान के लिए यह आंतरिक कलह आत्मघाती साबित हो सकती है। एक तरफ मसूद पेजेशकियान दुनिया के साथ कूटनीतिक रास्ते तलाशने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ आईआरजीसी केवल सैन्य शक्ति के प्रदर्शन पर उतारू है। यदि यह सत्ता संघर्ष इसी तरह जारी रहा, तो ईरान में निर्वाचित सरकार का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो सकता है और देश औपचारिक रूप से एक सैन्य तानाशाही में तब्दील हो सकता है। विश्व शक्तियां इस घटनाक्रम को बारीकी से देख रही हैं, क्योंकि ईरान के भीतर की यह अस्थिरता पूरे मध्य-पूर्व के भविष्य को प्रभावित करेगी।

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