Iran Crisis
Iran Crisis: मध्य-पूर्व के युद्ध की लपटों के बीच ईरान के भीतर एक नया और गंभीर मोर्चा खुल गया है। यह मोर्चा बाहरी दुश्मनों के खिलाफ नहीं, बल्कि देश की सत्ता के दो सबसे शक्तिशाली केंद्रों—सरकार और सेना—के बीच है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के प्रमुख अहमद वाहिदी के बीच युद्ध की रणनीति और देश की गिरती अर्थव्यवस्था को लेकर गहरे मतभेद उभरकर सामने आए हैं। जहाँ पेजेश्कियान एक नरमपंथी दृष्टिकोण अपनाकर युद्ध विराम की वकालत कर रहे हैं, वहीं वाहिदी की कट्टरपंथी विचारधारा संघर्ष को और तेज करने पर आमादा है।
‘ईरान इंटरनेशनल’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने IRGC की मौजूदा युद्ध नीति पर कड़े सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि पड़ोसी देशों पर लगातार हमले और बढ़ता अंतरराष्ट्रीय तनाव ईरान को आर्थिक तबाही की ओर धकेल रहा है। राष्ट्रपति ने एक बंद कमरे की बैठक में चेतावनी दी है कि यदि युद्ध को तत्काल नहीं रोका गया, तो अगले 21 से 30 दिनों के भीतर ईरान की बैंकिंग प्रणाली और पूरी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो सकती है। यह पहली बार है जब सरकार के शीर्ष स्तर से देश की वित्तीय स्थिति को लेकर इतनी गंभीर आशंका जताई गई है।
7 मार्च को राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया था। इस संदेश में उन्होंने पड़ोसी देशों पर हुए हमलों के लिए माफी मांगी और सेना को संयम बरतने के निर्देश दिए। हालांकि, उनके इस सार्वजनिक बयान के बावजूद IRGC ने अपनी आक्रामक कार्रवाइयां जारी रखीं। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि ईरान में निर्वाचित सरकार और अर्धसैनिक बल IRGC के बीच समन्वय पूरी तरह टूट चुका है। सेना अब राष्ट्रपति के आदेशों को दरकिनार कर अपनी स्वतंत्र रणनीति पर काम कर रही है।
देश के बिगड़ते हालातों को देखते हुए राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने मांग की है कि प्रशासन और निर्णय लेने की पूर्ण शक्तियां वापस सरकार को सौंपी जाएं। उनका मानना है कि नागरिक प्रशासन ही आर्थिक संकट को बेहतर ढंग से संभाल सकता है। लेकिन IRGC प्रमुख अहमद वाहिदी ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। वाहिदी का कहना है कि मौजूदा संकट के लिए सेना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं, क्योंकि युद्ध शुरू होने से पहले आर्थिक सुधारों की अनदेखी की गई थी। सेना और सरकार के बीच यह “ब्लेम गेम” (आरोप-प्रत्यारोप) स्थिति को और अधिक जटिल बना रहा है।
ईरान के भीतर से आ रही रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध का असर अब आम लोगों की जेब पर साफ दिखने लगा है। कई बड़े शहरों में एटीएम मशीनें या तो खाली हैं या तकनीकी रूप से ठप पड़ी हैं। ऑनलाइन बैंकिंग सेवाएं बार-बार बाधित हो रही हैं, जिससे व्यापार और दैनिक लेनदेन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। सरकारी कर्मचारियों के लिए स्थिति और भी विकट है; पिछले तीन महीनों से लाखों कर्मचारियों को उनके वेतन और भत्तों का भुगतान नहीं मिल पाया है। जनता के बीच बढ़ता यह असंतोष किसी भी समय बड़े नागरिक विद्रोह का रूप ले सकता है।
युद्ध शुरू होने से पहले ही ईरान की अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही थी, लेकिन अब हालात नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। फरवरी महीने के आंकड़ों के अनुसार, जरूरी सामानों और खाद्य पदार्थों की महंगाई दर 105% से 115% के बीच पहुँच गई है। युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) पूरी तरह बाधित हो गई है, जिससे बुनियादी चीजों की कीमतें आसमान छू रही हैं। इजरायली मीडिया ने भी दावा किया है कि ईरान की सत्ता के भीतर पड़ने वाली यह दरारें किसी बड़े तख्तापलट या शासन में आमूल-चूल परिवर्तन का संकेत हो सकती हैं।
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