Iran-US Crisis
Iran-US Crisis: मध्य पूर्व में जारी युद्ध और तनाव के बीच कूटनीतिक बयानों का दौर तेज हो गया है। ईरान ने वैश्विक मंच पर भारत, रूस और चीन की भूमिका को सराहते हुए अमेरिका और इजरायल पर तीखा प्रहार किया है। तेहरान का मानना है कि जहां कुछ देश शांति की दिशा में काम कर रहे हैं, वहीं कुछ शक्तियां युद्ध को भड़काने में जुटी हैं।
मुंबई में ईरान के काउंसल जनरल सईद रजा मोसयेब मोतलाघ ने समाचार एजेंसी ANI को दिए एक साक्षात्कार में भारत की कूटनीतिक भूमिका की जमकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली, मॉस्को और बीजिंग ने अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को जोखिम में डालकर भी शांति का मार्ग चुना है। मोतलाघ के अनुसार, इन तीनों देशों का रुख यह दर्शाता है कि वे दुनिया को संघर्ष से बाहर निकालना चाहते हैं। उन्होंने भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति बताते हुए कहा कि भारत ने हमेशा संवाद और कूटनीति का समर्थन किया है।
ईरानी दूत ने अमेरिका और इजरायल की रणनीतियों पर सवाल उठाते हुए उन्हें संघर्ष का मुख्य कारण बताया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह बड़ी विडंबना है कि आज अमेरिका और इजरायल ‘हत्या’ को ही समस्याओं का समाधान मान रहे हैं। मोतलाघ ने चेतावनी दी कि जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन मुद्दों के मूल कारणों का समाधान नहीं करेगा, तब तक दुनिया को लगातार अस्थिरता और युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों को क्षेत्रीय शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दिया।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकिया ने भी अमेरिका के साथ भविष्य में होने वाले समझौतों को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने संकेत दिया कि तेहरान बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए वॉशिंगटन को अपनी ‘तानाशाही वाली मानसिकता’ छोड़नी होगी। पेजेशकिया ने कहा कि किसी भी समझौते के सफल होने के लिए यह अनिवार्य है कि अमेरिका ईरान के लोगों के अधिकारों और उनकी संप्रभुता का सम्मान करे। उन्होंने स्पष्ट किया कि दबाव और प्रतिबंधों के जरिए ईरान को झुकाया नहीं जा सकता।
इस्लामाबाद वार्ता विफल होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने आक्रामक रुख पर कायम हैं। ट्रंप ने हालिया बयान में कहा कि वह इस बात की परवाह नहीं करते कि ईरान मेज पर आता है या नहीं, लेकिन वह यह सुनिश्चित करेंगे कि ईरान के पास कभी परमाणु हथियार न हों। ट्रंप ने दावा किया कि युद्ध और प्रतिबंधों के कारण ईरान की आर्थिक और सैन्य स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई है। उन्होंने आत्मविश्वास के साथ कहा कि अंततः ईरान को अपनी जरूरतों के लिए बातचीत के रास्ते पर वापस आना ही पड़ेगा।
कूटनीतिक खींचतान के बीच जमीनी हकीकत बेहद दर्दनाक बनी हुई है। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 2 मार्च के बाद से इजरायली हमलों में अब तक 2,055 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हमलों की तीव्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल पिछले रविवार को ही 35 लोग मारे गए। घायलों की संख्या भी 6,588 तक पहुंच गई है। सीजफायर की घोषणाओं के बावजूद लेबनान में बमबारी का सिलसिला नहीं थमा है, जिससे मानवीय संकट और गहरा गया है। अब पूरी दुनिया की नजरें आगामी कूटनीतिक प्रयासों पर टिकी हैं।
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