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Iran protests 2026: तेहरान के बाजार बंद, सड़कों पर उतरे लोग, ईरान में शासन के खिलाफ भारी विद्रोह

Iran protests 2026:  ईरान इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। पिछले तीन दिनों से देश के विभिन्न शहरों की सड़कों पर हिंसा और आक्रोश का माहौल है। आर्थिक संकट की मार झेल रहे आम नागरिक अब चुप बैठने को तैयार नहीं हैं। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और राष्ट्रीय मुद्रा ‘रियाल’ के मूल्य में आई ऐतिहासिक गिरावट ने जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। जो प्रदर्शन शुरुआती दौर में केवल रोटी और रोजगार की मांगों तक सीमित थे, वे अब देखते ही देखते राजनीतिक विद्रोह में तब्दील हो गए हैं। प्रदर्शनकारी अब सीधे तौर पर सत्ता परिवर्तन और शासन प्रणाली को बदलने की मांग कर रहे हैं।

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Iran protests 2026: मुद्रा के अवमूल्यन ने तोड़ी व्यापार की कमर

इन विरोध प्रदर्शनों की तात्कालिक वजह ईरान की मुद्रा रियाल का धराशायी होना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में रियाल टूटकर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जहां एक अमेरिकी डॉलर की कीमत लगभग 14.2 लाख रियाल तक जा पहुंची है। मुद्रा की इस भारी गिरावट के कारण आयातित वस्तुओं और दैनिक उपभोग की चीजों के दाम आसमान छूने लगे हैं। व्यापार करना लगभग असंभव हो गया है, जिसके विरोध में तेहरान के ऐतिहासिक ग्रैंड बाजार और मोबाइल फोन बाजार के दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद कर दी हैं। व्यापारियों की यह हड़ताल अब एक व्यापक जन आंदोलन का रूप ले चुकी है।

Iran protests 2026: तेहरान से इस्फहान तक: आंदोलन का बदलता स्वरूप

ईरान में इस बार की स्थिति पिछले आंदोलनों से काफी भिन्न और चिंताजनक है। विरोध की यह चिंगारी केवल राजधानी तेहरान तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस्फहान, शिराज, यज्द और केरमानशाह जैसे प्रमुख औद्योगिक और सांस्कृतिक शहरों में भी फैल गई है। इस आंदोलन को तब और मजबूती मिली जब विश्वविद्यालयों के छात्र भी दुकानदारों और आम जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए। नारों का स्वरूप भी बदल गया है; अब लोग ‘तानाशाह को मौत’ जैसे सीधे और उग्र नारे लगा रहे हैं, जो सीधे तौर पर सर्वोच्च नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं।

विदेश नीति पर जनता का कड़ा प्रहार

ईरान की जनता अब अपनी आर्थिक तंगी के लिए सरकार की विदेश नीति को जिम्मेदार ठहरा रही है। प्रदर्शनों के दौरान “ना गाजा, ना लेबनान, मेरी जान सिर्फ ईरान के लिए” जैसे नारे गूँज रहे हैं। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ईरानी नागरिक अब सरकार द्वारा बाहरी संघर्षों और उग्रवादी समूहों को दिए जा रहे भारी वित्तीय समर्थन से तंग आ चुके हैं। उनका मानना है कि देश का पैसा विदेश में युद्ध लड़ने के बजाय घरेलू अर्थव्यवस्था को सुधारने और महंगाई कम करने पर खर्च होना चाहिए।

बेनतीजा बातचीत और सरकार का सख्त रवैया

राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने ट्रेड यूनियनों से संवाद स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन उनके बयानों ने जनता में और भी असुरक्षा पैदा कर दी। राष्ट्रपति ने स्वीकार किया कि अर्थव्यवस्था की स्थिति अत्यंत नाजुक है और बजट घाटे को पूरा करने के लिए 62% टैक्स वृद्धि की आवश्यकता है। महंगाई दर पहले ही 50% के करीब है, ऐसे में जनता पर अतिरिक्त कर का बोझ डालना आग में घी डालने जैसा साबित हुआ है। दूसरी ओर, सुरक्षा एजेंसियां बल प्रयोग और आंसू गैस का सहारा ले रही हैं, जिससे टकराव और बढ़ गया है।

युद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की दोहरी मार

ईरान की इस दुर्दशा के पीछे केवल कुप्रबंधन ही नहीं, बल्कि हालिया युद्ध भी एक प्रमुख कारण है। पिछले साल इजरायल और अमेरिका के साथ हुए 12 दिवसीय भीषण संघर्ष ने देश के बुनियादी ढांचे और परमाणु ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचाया। इस युद्ध में जान-माल की भारी क्षति हुई, जिसके परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र ने वे कड़े प्रतिबंध दोबारा लागू कर दिए जो एक दशक पहले हटाए गए थे। इन प्रतिबंधों ने ईरान के तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली को पंगु बना दिया है, जिससे देश एक अंतहीन आर्थिक भंवर में फंस गया है।

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